जाति गणना : तेजस्वी ने सवर्णों से कही वो बात जो किसी ने न कही

जाति गणना पर अब तक एक दूसरे से विपरीत दो प्रतिक्रियाएं रही हैं। एक वंचितों को न्याय मिलेगा तथा दूसरा समाज में द्वेष फैलेगा। तेजस्वी ने कही सबसे अलग बात।

जाति गणना : तेजस्वी ने सवर्णों से कही वो बात जो किसी ने न कही

कुमार अनिल

बिहार में जाति गणना को लेकर दो विरोधी विचार रहे हैं। एक विचार इसे वंचितों के हित में बताता रहा है तथा दूसरे तरह के लोग इसका विरोध करते रहे हैं कि जाति गणना से समाज में विद्वेष फैलेगा। अब उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सबसे अलग एक तीसरा विचार रखा है। उन्होंने यह तो कहा ही कि जाति गणना से वंचितों को न्याय मिलेगा, लेकिन इसके साथ उन लोगों को भी तर्क से समझाया जो जाति गणना का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर 100 में 85 लोग गरीब, कमजोर रहें, तो जो अपेक्षाकृत खुशहाल हैं, उनका विकास भी अवरुद्ध हो जाएगा। अगर इन 85 प्रतिशत लोगों की आय बढ़ेगी, इनका जीवन स्तर ऊंचा होगा, तो सबकी खुशहाली का रास्ता खुलेगा।

राजद कार्यालय से जारी बयान के अनुसार तेजस्वी यादव ने कहा कि बिहार के हर गरीब, वंचित और अच्छे भविष्य की चाहत रखने वाले व्यक्ति के लिए यह अत्यंत खुशी का विषय है कि माननीय पटना उच्च न्यायालय ने कल जाति आधारित सर्वेक्षण पर आगे बढ़ने के लिए बिहार सरकार को हरी झंडी दिखा दी है।

जब से जातिगत जनगणना करवाने के लिए आवाज़ उठाई जा रही थी, ऐसी जनगणना करवाने के लिए प्रयास हो रहे थे, तभी से कुछ राजनीतिक दल व जातिवादी लोग इसके विरुद्ध दुष्प्रचार में लग गए थे। उन्होंने प्रचारित करना शुरू कर दिया कि यह केवल कमज़ोर वर्गों के ही हित में है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक उलट यह है कि यह सभी वर्गों के सभी लोगों के हित में समान रूप से है। समाज एक शरीर की भाँति होता है। एक अंग के पीड़ा में होने या कमज़ोर होने पर उसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है। एक अंग के कमज़ोर होने पर सभी अंग धीरे धीरे कमज़ोर होने लगते हैं। उसी प्रकार समाज या देश के कुछ वर्गों के पीछे रह जाने से आगे निकल चुके वर्ग भी अपने पूरे सामर्थ्य और प्रतिभा के अनुसार आगे नहीं बढ़ पाते हैं। इसका देश के विकास और सामाजिक सौहार्द पर इसका प्रतिकूल दुष्प्रभाव पड़ता है।

कई लोगों ने जाति आधारित जनगणना के विरोध में यह भी कहा कि जाति के आँकड़े जुटाने की क्या आवश्यकता है? इससे तो समाज का विभाजन होगा। दरअसल भारत में प्रारंभ से ही जाति और वर्ण के आधार पर व्यवसायों और समाज में लोगों के महत्व का विभाजन और वर्गीकरण हुआ। इस प्रकार व्यक्ति विशेष की आर्थिक स्थिति पर उसकी जाति का प्रभाव पड़ा। इतना ही नहीं, कुछ व्यवसायों को श्रेष्ठ तो कुछ को तुच्छ भी बताया गया। इन कारणों से पीढ़ी दर पीढ़ी लोग एक ही व्यवसाय में सीमित रहे। इससे आपका जीविकोपार्जन और आर्थिक स्थिति इस बात पर निर्भर करने लगा कि अपना जन्म किस वर्ण में हुआ, ना कि आपकी इच्छा या कौशल पर।

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इसी कारण पूरी जाति विशेष के लोगों की आर्थिक स्थिति भी कमोबेश एक सी ही रही। इसीलिए कुछ वर्ग एक साथ धीरे धीरे पिछड़ते चले गए। अगर जाति के कारण कुछ लोगों में आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन व असमानता आया है, तो इस समस्या के कारणों का जुटान, उस पर अनुसंधान और इसका निदान भी जाति के वैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।

हर देश, सरकार, संगठन या संस्थाएँ हर प्रकार के आँकड़े जुटाती है और उन आँकड़ों को आधार बनाकर आगे की प्रभावी योजनाएँ बनाती है, निर्णय लेती है। सटीक आँकड़ों की मदद से समय, पैसों, संसाधनों और प्रयासों की बर्बादी से बचा जा सकता है। सही जानकारी होने से आवंटन, समय सीमा, जुटाने और काम पर लगाने के लिए ज़रूरी संसाधन व आवश्यक संख्या में मानव-बल का भी सही सही अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

अगर बात कुछ जाति विशेष या वर्ग विशेष के लोगों के प्रशिक्षण, शिक्षा, कल्याण, उत्थान और रोजगार की हो तो सरकार अथवा प्रशासन के पास अब जातिगत जनगणना के कारण सही सही और पूरी जानकारी पहले से उपलब्ध होगी। ऐसे उपलब्ध आँकडों का लाभ सभी वर्गों को मिलेगा क्योंकि इन आँकड़ों से विकास की गति को पंख लगेंगे। और यह सभी जानते हैं कि जब भी कहीं तीव्रगति से विकास होता है तो उस विकास का लाभ सभी को समान रूप से मिलता है। यही कारण है कि बिहार के लिए कल का दिन कई मायनों में ऐतिहासिक था जब माननीय पटना उच्च न्यायालय ने जातिगत जनगणना के रास्ते में डाले जा रहे अड़चनों को हटाकर समग्र विकास के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।

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