ललन इफेक्ट : कम नंबर के बावजूद जदयू बना बड़ा भाई

ललन इफेक्ट : कम नंबर के बावजूद जदयू बना बड़ा भाई

जैसे फिजिक्स में आइंस्टीन इफेक्ट, अर्थशास्त्र में कीन्स इफेक्ट होता है, वैसे ही एनडीए में ललन इफेक्ट दिखने लगा है। कम नंबर के बावजूद जदयू बना बड़ा भाई।

कुमार अनिल

आप जानते हैं विज्ञान की शाखाओं में सैकड़ों इफेक्ट होते हैं। उसी तरह बिहार एनडीए की राजनीति में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह का इफेक्ट भी दिखने लगा है। इसे आप ललन इफेक्ट भी कह सकते हैं।

आरसीपी सिंह के अध्यक्ष रहते जदयू अंर्तमुखी पार्टी लगती थी। इसकी वजह यह थी कि खुद आरसीपी सिंह वैचारिक रूप से भाजपा के ज्यादा करीब रहे हैं। उन्होंने कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे भाजपा को चुनौती मिलती हो। उनका पूरा ध्यान संगठन और उसके प्रकोष्ठों तक सीमित था। ललन सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी अब बहिर्मुखी (एक्सट्रोवर्ट) दिखने लगी है। इसका प्रमाण हाल में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पारित प्रस्ताव हैं।

जदयू के नौ प्रस्तावों में कुछ संगठन के आंतरिक मसलों पर केंद्रित हैं, लेकिन मुख्यतः ये प्रस्ताव भाजपा को परेशानी में डालनेवाले हैं। जदयू के प्रस्तावों का विरोध करने के लिए भाजपा के कोई बड़े नेता सामने नहीं आए। भाजपा ने पार्टी की दूसरी पंक्ति के कम चर्चित नेता को सामने किया।

जदयू ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार में पीएम मेटैरियल होने का प्रस्ताव पारित किया, जो साधारण बात नहीं है। अमूमन ऐसा प्रस्ताव कोई पार्टी नहीं ग्रहण करती, लेकिन भाजपा के बड़े नेता क्यों सामने नहीं आए? भाजपा के बड़े नेताओं को मालूम है कि बोलने का अर्थ है तुरत जवाब मिलेगा। जवाब पहले से ज्यादा दृढ़ होगा और इससे भाजपा की ही परेशानी बढ़ेगी।

इस बिंदु पर आकर भाजपा ने जदयू को अपना बड़ा भाई मान लिया। केवल दस महीने में राजनीति 180 डिग्री घूम गई है। पिछले साल नवंबर में जब जदयू को केवल 43 सीटें मिलीं और भाजपा को 74 तो राजनीतिक क्षेत्रों में यह चर्चा आम थी कि जदयू छोटा भाई बन कर रह गया। कई अखबारों ने इसे चिह्नित भी किया था, लेकिन ललन इफेक्ट देखिए कि 43 सीट वाला जदयू आगे बढ़ कर बोल रहा है और भाजपा के किसी बड़े नेता को सामने आकर काउंटर करने की हिम्मत नहीं हो रही है।

ललन सिंह मंझे हुए राजनीतिज्ञ हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि नीतीश में प्रधानमंत्री बनने के सारे गुण हैं, लेकिन वे फिलहाल प्रत्याशी नहीं हैं। इस पंक्ति में दोहरी राजनीति है। एक तरफ भाजपा के लिए बड़ा संदेश है कि वह जदयू को छोटा समझने की भूल न करे, वहीं इस पंक्ति ने पार्टी कतारों में भी जोश भर दिया है। ललन सिंह ने बता दिया कि राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होता। अनुभव, साहस और मौके की समझ हो, तो आठ भी हो सकता है।

कहां पिछले साल राजनीतिक विश्लेषक कह रहे थे कि भाजपा जैसे अन्य राज्यों में अपने सहयोगियों को पचा गई है, उसी तरह जदयू को भी पचा लेगी, और कहां आज यह स्थिति कि जदयू ही आगे बढ़कर बोल रहा है और कोई काटनेवाला नहीं। इन दस महीनों में बहुत कुछ बदल गया।

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एक बात और भी गौर करनेवाली है कि जदयू के 9 प्रस्तावों में एक भी ऐसा नहीं है, जो राजद के खिलाफ जाता हो, बल्कि कुछ प्रस्ताव उससे नजदीकी दिखाते हैं, जैसे जातीय जनगणना का सवाल। इस सावल पर भाजपा आजतक मुखर नहीं हो पाई है। जदयू ने उन अटकलों पर विराम नहीं लगाया, जिसमें फिर से नीतीश कुमार विपक्ष की राजनीति कर सकते हैं, कहा जा रहा है।

नीतीश कुमार और ललन सिंह दोनों ही प्रैगमैटिक प़लिटिक्स के लिए जाने जाते हैं, इसलिए देखिए आगे-आगे होता है क्या?

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