बोधगया में देशभर के बौद्ध भिक्षु पिछले 41 दिनों से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन बिहार की नीतीश कुमार तथा भाजपा की सरकार का कोई प्रतिनिधि न तो उनसे मिलने पहुंचा है और न ही उन्हें बातचीत के लिए बुलाया गया है। उनकी मांग है कि बिहार में 1949 में बना बीटी एक्ट रद्द किया जाए।
बीटी एक्ट के तहत प्रावधान है कि बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार के लिए प्रबंधन कमेटी में 9 लोग होंगे, जिनमें चार बौद्ध, चार हिंदू तथा गया का जिलाधिकारी। बौद्ध भिक्षुओं का कहना है कि महाविहार की प्रबंधन समिति का यह प्रावधान संविधान के खिलाफ है। बौद्ध महाविहार का प्रबंधन बौद्ध समुदाय को दिया जाए। याद रहे यह कानून भारत में संविधान बनने के पहले का है।
इस कानून के कारण वस्तुतः महाविहार पर पंडों तथा हिंदुओं का ही कब्जा है। महाविहार के निकट जिसे मन में आता है एक मंदिर खड़ा कर देता है। इससे होने वाली आमदनी भी बौद्ध विहार पर खर्च नहीं होती है। हर धर्म का धार्मिक स्थल उसी धर्म के लोगों के नियंत्रण में रहता है, फिर बौद्ध धर्म के साथ ऐसा अन्याय क्यों।
महाविहार मुक्ति आंदोलन नाम से चल रहे आंदोलन में अब लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रदर्शन में देश भर के भिक्षु तथा उपासक शामिल हैं। आगामी 5 अप्रैल को बौद्ध के अनुयायी लाखों की संख्या में गया में जुटेंगे औऔर नीतीश सरकार से बीटी एक्ट रद्द करने की मांग करेंगे।
मालूम हो कि बिहार में राजद, माले सहित कई दलों ने बौद्ध अनुयायियों की मांगों का समर्थन किया है। विधान सभा में भी मामला उठ चुका है। सरकार से नाराजगी बढ़ी जा रही है, जिसका खामियाजा एनडीए को चुनाव में हो सकता है।