Nitish Effect Of Politcs तो कुछ यूं लिखा जायेगा इतिहास

Nitish Effect Of Politcs तो कुछ यूं लिखा जायेगा इतिहास

जाति जनगणना के मुद्दे पर Nitish Kumar भाजपा को बाहर कर RJD संग सरकार बना लें तो कोई अचरज नहीं.आखिर इतिहास, Nitish Effect Of Politcs का कैसे आंकलन करेगा.

पिछले 17 वर्षों से बिहार की राजनीति के केंद्र में कोई एक शख्स है तो वो हैं नीतीश कुमार. करीब इतने वर्षों से कुछ कम समय से राज्य के मुख्य मंत्री हैं. परंतु उनकी पार्टी कभी अपने बूते सत्ता में नहीं आयी. फिर भी उन्होंने अपनी शर्तों पर सरकार चलाई. दो बार तो ऐसा हुआ कि उनकी सहयोगी पार्टी की तुलना में उनकी पार्टी से ज्यादा विधायक रहे. फिर भी झख मार कर सहयोगी दलों ने उन्हें ही मुख्यमंत्री माना. 2020 के चुनाव में तो नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे पायदान पर खिसक गयी. करीब दोगुनी सदस्य क्षमता के बावजूद भाजपा के सामने कोई चारा न था. बेबस भाजपा ने तब भी उन्हें ही मुख्यमंत्री माना.

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अब जबकि आज की मौजूदा परिस्थितियां यह आभास दे रही हैं कि नीतीश कुमार जातीय जनगणना ( Caste Censusu) के मुद्दे पर भाजपा को किक आउट कर फिर राजद के साथ सरकार कभी भी बना सकते हैं. दर असल नीतीश कुमार की राजनीतिक हैसियत फिलहाल सेबसे कमजोर है. फिर भी वह पक्ष-विपक्ष सभी के सत्ता पाने की इच्छा के लिए संजीवनी हैं. इसी लिए इन पंक्तियों के लेखक ने इसे Nitish Effect of Politcs यानी राजनीति का ‘नीतीश प्रभाव’ का नाम दिया है.

यहां हम कुछ उन चुनिंदा राजनीतिक परिघटनाओं का उदाहरण के साथ उल्लेख करेंगे कि कैसे Nitish Effect Of Politcs के बूते मुश्किल हालात में भी बिहार की राजनीति को नीतीश कुमार अपनी बनाई धुरी पर सियासत को नचाने में सफल रहे.

एक

यह 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद के दिन थे. 2012-13 तक खुद भाजपा नेताओं द्वारा ‘पीएम मैटेरियल’ घोषित किये जाते रहे नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी की चुनावी आंधी में उड़ गये थे. भाजपा से अलग हो कर चुनाव लड़े जदयू 2 सीटों पर सिमट गयी. इसके बाद अचानक नीतीश कुमार ने एक राजनीतिक संत के किरदार में नजर आये. और उन्होंने बिहार की सत्ता एक गुमनाम से विधायक जीतन राम मांझी को सौंप दी. खुद मुख्यमंत्री आवस से निकल कर दूसरे सरकारी बंगले में चले गये. लेकिन तब कुछ महीनों बाद उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने ब्लंडर कर दिया है. उनकी सोच के बरअक्स मांझी ने सत्ता की पूरी ताकत अपने अधीन करने की मुहिम शुरू कर दी. ऐसे में नीतीश को एहसास हो गया कि उन्होंने सत्ता से मांझी को बेदखल नहीं किया तो वह हाशिये में गुम हो जायेंगे. ऐसे में सवाल यह था कि मांझी को सत्ता से बेदखल कैसे किया जाये. तब नीतीश कुमार ने कुछ ऐसे सियासी दांव पेश किये कि विपक्ष में बैठे राष्ट्रीय जनता दल को आगे आना पड़ा. तब भाजपा के लाख प्रयास के बावजूद नीतीश और लालू ने मिल कर मांझी को गद्दी से हटाया और नीतीश कुमार 2015 के विधान सभा चुनाव से पहले फिर से मुख्यमंत्री बन गये.

दो

यह Nitish Effect Of Politcs ही था जब 2014 के लोकसभा चुनाव में 40 में से 38 सीट पर बुरी तरह हारने के बावजूद नीतीश कुमार ने 2015 विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल से अपनी शर्तों पर गठबंधन किया. चुनाव में बराबर-बराबर सीटों पर दोनों दल- राजद व जदयू ने चुनाव लड़ा. पर जदयू को कम सीटें आयीं. सीटें कम होने के बावजूद नतीश कुमार ने ऐसे सियासी दाव चले कि चुनाव से पहले ही उन्होंने लालू प्रसाद से वादा ले लिया था कि नतीजा जो भी हो, मुख्यमंत्री वही बनेंगे. लिहाजा नीतीश फिर सीएम कुर्सी पर विराजमान हो गये. तब उनकी सरकार कोई डेढ़ साल चली.

तीन

उधर राजद के साथ सरकार चला रहे नीतीश के दिल में कोई और रणनीति जन्म लेती रही. राजद अध्यक्ष के ऊपर रेलमंत्री रहते हुए कथित घोटाले करने के आरोप लगाये गये और सीबीआई ने 7 जुलाई 2017 को उनके आवास पर छापामारी की. इसे एक रणनीति के तह इसे ही मुद्दा बना कर नीतीश उनसे अलग हो गये. उसी दिन रात होते होते नीतीश कुमार ने अपनी सरकार का इस्तीफा दिया और देर रात तक भाजपा के सहयोग से दुबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली. इससे पहले दस सालों तक भाजपा संग सरकार चलाने का अनुभव नीतीश को था ही. बस सरकार बदलने के लिए उन्होंने Nitish Effect Of Politcs का इस्तेमाल किया. फिर सब कुछ आसानी से उनके नियंत्रण में आ गया. उधर राजद बेबस हाथ मलता रह गया.

चार

2020 के विधान सभा चुनाव की स्थितियां नीतीश कुमार के खिलाफ बनती जा रही थीं. गठबंधन में होने के बावजूद चिराग पासवान उनके मुखर विरोधी हो चुके थे. समझा जाता है कि यह भाजपा की रणनीति थी जिसके चलते चिराग पासवान ने अपनी पार्टी के प्रत्याशी नीतीश कुमार के जनता दल यू के खिलाफ खड़े कर दिये. जबकि भाजपा के प्रत्याशियों के वे समर्थन में वोट मांगते रहे. हालांकि भाजपा के साथ नीतीश और चिराग दोनों का गठबंधन बरकरारा था. उधर तेजस्वी यादव ने एक मजबूत विपक्षी नेता की भूमिका निभाई. चुनाव के नतीजे आये तो राजद सबसे बड़ा दल बनके उभरा. जबकि भाजपा दूसरे नम्बर रही. लेकिन सबसे बुरी गत नीतीश कुमार की पार्टी की हुई. उनकी पार्टी को मत्र 43 सीटें मिलीं. जबकि भाजपा को 74 सीटें मिलीं. ऐसे में भाजपा-जदयू गठबंधन में, भाजपा लगभग दोगुनी क्षमता वाली पार्टी बनी फिर भी भाजपा ने नीतीश कुमार को वॉक अवर दे दिया. सीटें दो गुनी होने के बावजूद वह नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की. चूंकि बहुमत का गणित ऐसा था कि नीतीश कुमार को पता था कि भाजपा झख मार कर उन्हें ही मुख्यमंत्री बनायेगी. हुआ भी वैसा ही. भाजपा को, नीतीश संकेतों में डराते रहे कि अगर उन्हें सीएम नहीं बनाया गया तो भाजपा को महंगा पड़ेगा. यहां भी Nitish Effect Of Politcs ( राजनीति के नतीश प्रभाव) ने अपना रंग दिखा दिया.

पांच

अभी जब हमारे पाठक इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, तब जो हालात बनते दिख रहे हैं, उसमें भी Nitish Effect Of Politcs अपना काम कर रहा है. पिछले एक साल से नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना ( Caste based Census) को तुरूप का पत्ता बना दिया है. केंद्र की मोदी सरकार ने दो टूक कह दिया है कि केंद्र जातीय जनगणनना नहीं करायेगी. इधर नीतीश खुद राज्यस्तर पर इस काम को करना चाहते हैं. दूसरी तरफ तेजस्वी यादव भी अडिग हैं कि जातीय जनगणना हो. इसके लिए नीतीश कुमार और तेजस्वी की बंद कमरे में अनेक मुलाकातें हो चुकी हैं. तमाम संकेत यह बता रहे हैं कि फिर Nitish Effect of Politcs अपना काम कर रही है. अगर भाजपा ने इस मुद्दे पर अपना स्टैंड नहीं बदला तो कोई ठीक नहीं कि नीतीश कुमार और प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव मिल कर सरकार बना लें और भाजपा देखती रह जाये.

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