यादवेन्द्र के संपादन में छपी पुस्तक “साइकिल का जनतंत्र” पर बातचीत का आयोजन बापू टावर में किया गया जिसमें शहर के प्रमुख साहित्यकार, पत्रकार और और संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

 

इस अवसर पर बोलते हुए प्रख्यात कवि एवं पत्रकार संजय कुंदन ने कहा कि यूरोप में साइकिल के आविष्कार के साथ ही वहॉ के कमज़ोर वर्गों को एक नयी ताक़त मिली। मज़दूरों और मेहनतकशों के बीच संवाद बढ़ा और श्रमिक आंदोलनों को ज़मीन मिली। उन्होंने कहा कि साइकिल एक आदिम विद्रोह है जिससे हम नयी दुनिया से रूबरू होते हैं। इसने महिलाओं की आज़ादी और उनके पहनावे को नया आयाम दिया।

 

 

प्रगतिशील लेखक संघ की नेत्री और साहित्यकार डॉक्टर सुनीता गुप्ता ने कहा कि साइकिल ने स्त्रियों को एक नयी दुनिया से परिचित कराया है। वो पितृसत्ता को चुनौती दे रही हैं। साइकिल के बहाने नये सामाजिक बदलावों की आहट इस संकलन में सुनाई देती हैं।

 

इस अवसर पर बोलते हुए पत्रकार प्रणय प्रियंवद ने बताया कि साइकिल आम लोगों के जीवन में एक ज़रूरी हस्तक्षेप है जिसके सहारे वो दुनिया को देखता और समझता है। साइकिल को लेकर हम सबके पास अपने संस्मरण हैं। उन्होंने इस किताब के संपादक यादवेन्द्र जी की साइकिल के प्रति दीवानगी का ज़िक्र करते हुए साइकिल के जीवन की अनिवार्य ज़रूरत है।

 

इस अवसर पर बोलते हुए सुशील कुमार ने कहा कि यादवेन्द्र जी की साइकिल पर केन्द्रित ये दूसरी किताब है। उन्होंने कहा कि यादवेन्द्र जी की साइकिल को लेकर दीवानगी अद्वितीय है जो उनकी इस किताब में उपस्थित है। उन्होंने रेखांकित किया कि इस संकलन में कहानी है, कवितायें हैं, संस्मरण हैं जिसमें केन्द्रीय तत्व साइकिल है। साइकिल हमारे जीवन के लोकतांत्रिक तत्वों का सम्मिलन तत्व है।

 

इस अवसर पर इस किताब के संपादक यादवेन्द्र ने साइकिल को लेकर अपने संस्मरण सुनाये और इस किताब को लिखने के प्रेरक तत्वों का विस्तार से वर्णन किया। कार्यक्रम का संचालन कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्र ने किया।

 

इस अवसर पर सफ़दर इमाम कादरी, श्रीकांत, नीलांशु राजन, संजय कुमार कुंदन, गुंजन उपाध्याय पाठक, कृष्ण समिद्ध, चंद्रबिंद, अफशां अंजुम, प्रियदर्शी मैत्री शरण, राजेश कमल, अरूण जी, गोपाल शर्मा, ईर्शादुल हक, रमेश सिंह, मनोरंजन, मनजीत आनंद साहू, अविनाश बंधु, बापू टावर के निदेशक विनय कुमार, उप निदेशक ललित कुमार सिंह उपस्थित थे।

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