छठी मइया के घाट दो सबक दे गए, गांठ बांध लें, काम देगा

छठी मइया के घाट दो सीख दे गए, गांठ बांध लें, काम देगा

मनोकामना पूरी करने के लिए पूजा करना अध्यात्म के स्कूल का बच्चा क्लास है। ऊपर के क्लास में कामना खत्म होती जाती है। छठ घाट ने दी दो सीख।

कुमार अनिल

पूछा जाए कि छठ का महत्व क्या है, तो हर व्यक्ति के पास कुछ-न-कुछ जवाब है। व्रतियों की श्रद्धा, इस पर्व के गीत और सफाई-स्वच्छता पर भी हर व्यक्ति के पास अपना उत्तर है। एक बात पर कम चर्चा होती है, वह कि क्या छठ के घाट हमें क्या सिखाते हैं।

अगर आप गौर करें, तो छठ घाट दो बड़ी सीख देते हैं। पहला, सामूहिकता तथा दूसरा समावेशीकरण (inclusiveness)। इसे आप समग्रता भी कह सकते हैं। सामूहिकता को समझना आसान है, इसलिए आइए, पहले समावेशीकरण को समझने के लिए पटना के चमनचक-विजयनगर छठ घाट चलते हैं।

पटना बाइपास किनारे चमनचक और विजय नगर है। यहां 70 फीट लंबा और 40 फीट चौड़ा छठ घाट इसी साल बना। घाट की सीढ़ियों को छोड़ दें, तो वास्तव में व्रतियों के लिए जल में खड़ा होने की जगह और भी कम है। इतने छोटे घाट पर हजार से ज्यादा लोगों ने अर्घ दिए। सुबह चार बजे से ही व्रती आने लगे। व्रती दउरा और सूप आगे-पीछे नहीं, सामने फैला कर रख रहे थे। बड़ी चिंता हुई कि थोड़ी देर बाद भीड़ बढ़ेगी, तो क्या होगा। कई बार माइक से घोषणा कराई गई कि व्रती दउरा फैला कर न रखें। पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। चिंता और बढ़ी। लेकिन यह चिंता बेकार साबित हुई। जैसे-जैसे व्रती आते गए, सभी उसी में एडजस्ट करते गए। सुबह छह बजे तो तिल रखने की जगह नहीं थी। लेकिन कोई हंगामा नहीं, कोई विवाद नहीं। सबका अर्घ समय से हो गया। और बड़ी बात कि सभी खुश।

यह जादू कैसे हुआ? यह हुआ समावेशीकरण के कारण। समाज में जाति और धर्म के नाम पर विवाद बढ़ा है। लोग कहते हैं, फलां जाति के लोग अच्छे नहीं होते। कोई कहता है, फलां धर्म के लोग बुरे होते हैं। इसे कहते हैं समावेशीकरण का उल्टा बहिष्करण (exclusive) अर्थात किसी को बाहर करना। समावेशीकरण का मतलब है, सबको लेकर चलना, सबको जगह देना, सबको अवसर देना। छठ के घाट यही सिखाते हैं कि किसी को जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर बाहर करना ठीक नहीं। सोचिए, इसी के कारण सभी प्रेम से पर्व पूरा करते हैं, तो इसे हम जीवन के 365 दिन अपनाएं, तो सबके जीवन में कितनी खुशी होगी। यही नहीं, देश में आज जो धर्म और जाति के नाम पर नफरत है, वह भी कम होगा। इसीलिए समाज में कोई नफरत की बात करे, तो उसे छठ घाट का यह मर्म समझाइए। छठ घाट का यह सूत्र व्यक्ति ही नहीं, देश के लिए भी महत्वपूर्ण है।

और सामूिकता की मिसाल भी दिखी। इस घाट के निर्णाण से पहले छठी मइया ने कड़ी परीक्षा ली। कई बाधाएं आईं, लेकिन वार्ड 44 के समाजसेवी आशीष चंद्र यादव उर्फ सत्येंद्र यादव और चमनचक के किरण कुमार जैसे अनेक युवाओं के कारण सारी बाधाएं दूर हुईं। छठ से एक हप्ता पहले अर्जुन, वकील साहब और बकेश जैसे दो दर्जन युवा दिन-दिन भर कार्य करते रहे। कई रात वो सोए नहीं। और रविवार- सोमवार को हर दउरा को देखते ही उसके लिए रास्ता बनाना, यहां तक कि दउरा को उतारने में हाथ बंटाना किसी को भी प्रेम से भर दे रहा था। आप यह प्रेम देखकर भावुक भी हो सकते हैं।

जितनी खुशी मनोकामना पूरी करने की इच्छा लेकर आए व्रतियों में थी, उससे कम खुशी इन निःस्वार्थ सेवा कर रहे युवकों में नहीं थी। ऐसे युवा हर मुहल्ले में हैं। उन्हें प्रणाम। सत्येंद्र यादव से आग्रह भी किया गया है कि ये युवा भले ही सम्मान पाने की इच्छा न रखते हों, पर इन्हें माला पहना कर सम्मानित करना चाहिए, ताकि हमारे समाज की यह परंपरा बढ़ती रहे।

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