जॉर्ज, शरद, दिग्विजय के नहीं हुए नीतीश, RCP की क्या बिसात

जॉर्ज, शरद, दिग्विजय के नहीं हुए नीतीश, RCP की क्या बिसात

जदयू के किसी प्रमुख नेता, विधायक ने अब तक नहीं कहा कि RCP को टिकट मिलना चाहिए। कोई पूर्व विधायक भी समर्थन में नहीं। हां, दूसरे दलों से मिलने लगी सहानुभूति।

एक समय नीतीश कुमार से बड़े कद के नेता थे, जार्ज फर्नांडिस और शरद यादव। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के निकट रह कर राजनीति में ऊपर चढ़नेवाले बांका के दिग्विजय सिंह भी बड़े नेता थे। इन सभी ने एक समय नीतीश कुमार की समता पार्टी को खड़ा करने में पूरी ताकत लगाई थी। इनमें जार्ज का चेहरा सबसे बड़ा था। जब नीतीश कुमार 1977 में साधारण स्तर के नेता थे, उन्हें तब लोकसभा का टिकट भी नहीं मिला था, उस समय जार्ज जेल में रहते हुए मुजफ्फरपुर से भारी मतों से चुनाव जीते थे। जब नीतीश कुमार का समय आया, तो जॉर्ज, शरद और दिग्विजय तीनों को टिकट के लिए न सिर्फ तरसाया, बल्कि टिकट से वंचित भी किया। ऐसे में आरसीपी सिंह की क्या बिसात है। वे उन तीनों नेताओं की तरह जन नेता भी नहीं हैं।

हाल यह है कि आरसीपी सिंह पटना में कमरे में बैठे हैं, पर मंत्री की बात छोड़ दीजिए कोई विधायक तक मिलने नहीं गया। जदयू के किसी पूर्व विधायक ने भी मिलना मुनासिब नहीं समझा।

हालांकि आरसीपी सिंह को जदयू के बाहर अब सहानुभूति मिलने लगी है। राजद नेता शिवानंद तिवारी ने आज कहा कि आरसीपी सिंह को जितना अपमानित करना था, उन्हें कर दिया गया, अब अंततः नीतीश उन्हें ही टिकट देंगे। लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने भी सहानुभूति जताते हुए कहा कि आरसीपी सिंह को राज्यसभा भेजा जाना चाहिए। भाजपा के कई नेता भी कह रहे हैं कि उन्हें भेजा जाना चाहिए। भाजपा के कुछ नेता तो यहां तक कह रहे हैं कि जदयू ने उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा, तो भाजपा भेजेगी, पर इसकी संभावना बहुत कम है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अभी नीतीश कुमार को नाराज नहीं कर सकता।

2009 में नीतीश कुमार ने दिग्विजय सिंह को टिकट नहीं दिया था। तब दिग्विजय निर्दलीय लड़ गए थे और चुनाव भी जीते थे। दिग्विजय सिंह रहनेवाले जमुई के थे, पर उनकी कर्मभूमि बांका रही। वहां उन्हें सम्मान से लोग दादा कहते थे। आरसीपी तो नालंदा के कुर्मियों के दादा भी नहीं हैं। अब जो भी होगा, सोमवार को होगा।

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