हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान, पर भाजपा में उदासी क्यों?

हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान, पर भाजपा में उदासी क्यों?

हिंदी-हिंदी करने वाली भाजपा चुप है, जबकि हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिला। गीतांजलि श्री को बुकर मिला। भाजपा के बड़े नेता बधाई भी नहीं दे रहे?

कुमार अनिल

हमेशा हिंदी को लेकर अति उत्साही भाजपा की खामोशी सवालों के घेरे में आ गई है। हिंदी लेखक और पाठक गीतांजलि श्री को दुनिया के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार बुकर पुरस्कार मिलने से गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं, खुश हैं, बधाई देते थक नहीं रहे, लेकिन भाजपा के बड़े नेता चुप हैं, क्यों? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गीतांजलि श्री को कोई बधाई नहीं दी। बिहार भाजपा के सबसे मुखर नेता सुशील कुमार मोदी धारा 370 पर ट्वीट कर रहे हैं, लेकिन किसी भारतीय लेखिका, वह भी हिंदी की लेखिका को अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलने पर चुप हैं। कायदे से हिंदी को इतना बड़ा सम्मान मिलने पर भाजपा की तरफ से बधाइयों का तांता लग जाना चाहिए, लेकिन सूखा पड़ा है।

इस सवाल को द वायर ने उठाया है। अरविंद दास ने द वायर में लिखा है कि दरअसल गीतांजलि श्री हिंदी-उर्दू की गंगा-जमनी तहजीब वाली धारा की लेखिका हैं। वह पिछले सौ वर्षों से जारी हिंदी-उर्दू की प्रगतिशील धारा की लेखिका हैं। कथा सम्राट प्रेमचंद पर गीतांजलि श्री का काम सराहनीय है। उनके उपन्यास रेत समाधि में भी वह सबकुछ है, जो आज के समय से जोड़ता है। इसमें भारत-पाकिस्तान बंटवारे, सांप्रदायिकता, पितृसत्तात्मक समाज आदि जैसे आज के मुद्दों पर गंभीर टिप्पणी है। जो लोग महिलाओं को घर का आभूषण बताते हैं और उनका काम घर की जिम्मेदारी संभालना ही समझते हैं, उन्हें गीतांजलि श्री का लेकन कभी पसंद नहीं आएगा। यह पुस्तक श्रेष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती को समर्पित हैं, जिनकी जिंदगीनामा भी सांप्रदायिकता के खिलाफ है।

गीतांजलि श्री को भले ही बड़े राजनीतिज्ञों ने नहीं सराहा, लेकिन वह हिंदी जगत में छा गई हैं। सिर्फ हिंदी क्यों, वह दक्षिण एशिया की किसी भी भाषा के पाठकों के दिलों में छा गई हैं।

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