Haque Ki Baat- हर हाल में NDA छोड़ेंगे नीतीश

Haque Ki Baat- हर हाल में NDA छोड़ेंगे नीतीश

Caste Census पर भाजपा द्वारा घुटने टेकने के बाद NDA के बच जाने के कयास के बावजूद Irshadul Haque दो कारण गिन कर बता रहे हैं कि जदयू, BJP से अलग हो के रहेगा.

काफी मंथन व आला कमान के चिंतन-मनन के बाद बिल आखिर BJP ने जातीय जनगणना (Caste Census) संबंधी सर्वदलीय बैठक (All Party Meeting) में शामलि होने के लिए हामी भर दी. जब तक भाजपा ने हामी नहीं भरी थी तब तक कई विश्लेषक यह बता रहे थे कि अगर भाजपा ने जातीय जनगणना का समर्थन न किया तो नीतीश NDA छोड़ देंगे.

लेकिन नीतीश कुमार ऐसे सधे हुए राजनेता हैं कि वह अब एनडीए के साथ रहने के नुकसान को भलिभांति समझ चुके हैं. दर असल नीतीश कुमार और भाजपा के रिश्ते की उम्र पूरी हो गयी है. लिहाजा अब नीतीश भाजपा का साथ छोड़ने में बहुत देर नहीं करेंगे.यहां हम उन कारणों को परखने की कोशिश कर रहे हैं.

पहला कारण

2005 से 2010 तक नीतीश कुमार एनडीए के सर्वमान नेता बने रहे. 2014 लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए छोड़ने के बाद जब वह 2017 में फिर एनडीए में आये तब भाजपा की सत्तालोलुपता की मजबूरी में नीतीश को सीएम बनाया गया. लेकिन 2020 विधान सभा चुनाव में जदयू ने दयनीय प्रदर्शन किया. महज 43 सीटें जीत सकी. जबकि भाजपा 74 सीटें जीती. यह पहला अवसर था जब पिछले 15 वर्षों में जदयू भाजपा से पिछड़ गया. पिछड़ा ही नहीं बल्कि उसकी क्षमता, भाजपा के लगभग आधी रह गयी. लेकिन विधानसभा का गणित ऐसा था कि नीतीश को सीएम नहीं बनाने का जोखिम भाजपा नहीं उठा सकी. इसके बावजूद समय समय पर नीतीश पर दबाव डाला जाता रहा कि वह अब सीएम पद छोड़ दें. यह तो नीतीश का राजनीतिक कौशल ही रहा कि वह इस दबाव का सामना कर सके. लेकिन अब जो आने वाली परिस्थितियां हैं वह नीतीश कुमार के लिए काफी चुनौतिपूर्ण होंगी. 2024 में लोकसभा और 2025 में विधान सभा चुनाव होने हैं. अब इन दो चुनावों की संभावना पर गौर करें.

नीतीश की प्रबल इच्छा रही है कि वह प्रधान मंत्री बनें. वह 2014 में ही चाह रहे थे कि एनडीए उन्हें पीएम कंडिडेट घोषित करे. भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी तैयार भी थे. लेकिन मोदी के धमाकेदार एंट्री ने सब कुछ धुंआ में उड़ा दिया. उसके बाद गंगा में काफी पानी बह चुका है. 2014 के बाद 2019 में मोदी का सिक्का फिर छा गया. अब मोदी तीसरे टर्म के लिए संघर्ष शुरू कर चुके हैं. ऐसे में एनडीए में रहते हुए नीतीश का पीएम बनने का सपना साकार होने से रहा. दूसरी तरफ 2020 विधान सभा चुनाव में जनता दल युनाइटेड की दयनीय स्थिति हो गयी. जदयू, भाजपा के अलायंस में रहने के बावजूद तीसरे नम्बर की पार्टी के रूप में सिमट गयी. लिहाजा अब भाजपा की महत्वकांक्षा काफी प्रबल है. वह किसी भी हाल में 2025 में नीतीश को मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं करेगी. वह नीतीश को ड्राइवर की सीट देने के बजाये खुद कुर्सी लेना चाहेगी. ऐसे में भाजपा के साथ रहते हुए नतीशी कुमार के लिए अब संभावनायें समाप्त होती जा रही हैं. गोया भाजपा से नीतीश के रिश्तों की उम्र लगभग पूरी हो चुकी है.

ऐसे में नीतीश के लिए बहतर राह क्या है? नीतीश के लिए अब एक नया विकल्प तैयार होने लगा है. नीतीश अब नये प्लान पर काम कर सकते हैं. भले ही जातीय जनगणनना पर भाजपा घुटने टेक चुकी है लेकिन आने वाले दिनों में नीतीश किसी और मुद्दे की तलाश करके भाजपा से दूरी बढ़ायेंगे. और अंत-अंत में राजद के साथ मिल कर सरकार बना लेंगे.

तब उनकी रणनीति क्या होगी?

2023 तक नीतीश मुख्यमंत्री बने रहेंगे. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वह तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद सौंप सकते हैं. उधर राजद इसके बदले अपने गठबंधन की तरफ से नीतीश कुमार को प्रधान मंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के लिए माहौल बनायेगा. चूंकि अनेक क्षेत्रीय दल जिसमें तृणमूल कांग्रेस, तमिलन नाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जैसे क्षेत्रीय नेता राहुल गांधी को पीएम स्वीकार करने के मूड में पहले से ही नहीं हैं. उधर यूपी में अखिलेश यादव के लिए भी राहुल एक कंटेंडर ही हैं. सो अखिलेश को भी तैयार किया जा सकता है.

दूसरा कारण

नीतीश कुमार की राजनीतिक दीक्षा समाजवादी माहौल में हुई है. जेपी, राम मनोहर लोहिया व जॉर्ज फर्नांडिस से उन्होंने काफी राजनीति सीखी है. लेकिन सत्ता के गणित ने उन्हें भाजपा तक पहुंचा दिया. उनके सामने अब जातीय जनगणना का मुद्दा है. वह इस मुद्दे की व्यापकता को बखूबी समझते हैं. बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग बिहार से बाह प्रभावहीन है. लेकिन जातीय जनगणनना का मुद्दे राजस्थान, मध्यप्रदेश, यूपी, तेलंगाना से ले कर तमिलनाडु तक या यूं कहें कि पूरे देश पर असर डालने की क्षमता रखता है. ऐसे में पिछड़ों की गोलबंदी के सहारे नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व को चुनौती देना ज्याद सुगम है. नीतीश इस मुद्दे को अपना कर एक मजबूत विपक्ष का नेतृत्व कर सकते हैं. साथ ही वह ऐसा करके, संन्यास से पहले, समाजवादी राजनीति की मूल धारा में वापस सकते हैं.

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