झामुमो ने राजभवन को चेताया, झारखंड को बंगाल न समझें

झामुमो ने राजभवन को चेताया, झारखंड को बंगाल न समझें

पहले बंगाल, फिर लक्षद्वीप और अब झारखंड में राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठे हैं। झामुमो ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते।

भाजपा जब चुनाव में हार जाती है, तो पिछले दरवाजे से शासन करना चाहती है। 2019 में महाराष्ट्र में राज्यपाल ने सुबह पांच बजे राष्ट्रपति शासन हटाकर भाजपा के देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। हालांकि यह दांव काम नहीं आया। हाल-फिलहाल बंगाल में जिस तरह राज्यपाल काम कर रहे हैं, उस पर सवाल उठे हैं। उनपर विपक्ष की तरह काम करने का आरोप लग रहा है।

अब झारखंड का राजभवन विवादों के घेरे में है। झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल की नियमावली की फाइल तलब की है। खास बात यह कि इससे पहले हेमंत सरकार ने फाइल भेजी, तो राज्यपाल ने फाइल लौटा दी। इसके बाद सरकार ने दुबारा फाइल भेजी। राज्यपाल ने दुबारा लौटा दी। सरकार ने तीसरी बार फाइल भेजी, तो राज्यपाल ने कोई जवाब ही नहीं दिया।

राज्यपाल का काम राज्य सरकार के कार्य में सहयोग करना है। लेकिन इस तरह बार-बार फाइल लौटाना कार्य में अड़ंगा डालना नहीं तो और क्या है। हेमंत सरकार जनता से चुनी हुई सरकार है। उसे तो जनता को आज नहीं कल जवाब देना ही होगा। उसने कार्य को आगे बढ़ाने के लिए नियमावली में बदलाव कर दिया और राज्यपाल की सहमति वाले बिंदु को समाप्त कर दिया। अब राज्यपाल ने इसी पर फाइल मांगी है।

झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने दो टूक शब्दों में कहा कि बंगाल में राज्यपाल कमलपाल बन गए हैं। मतलब बांगाल सरकार के लिए नहीं, भाजपा के लिए काम कर रहे हैं। भाजपा झारखंड में भी वैसा ही चाहती है। राज्यपाल का काम होता है कि वह राज्य सरकार की सलाह पर काम करे, लेकिन इसके विपरीत करने लगे, तो इससे राज्य का नुकसान होता है।

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सुप्रियो ने बताया कि नियमावली को हाईकोर्ट भी हरी झंडी दिखा चुका है। सुप्रियो ने आरोप लगया कि जैसे ही कोरोना की लहर कम हुई, भाजपा फिर से अपने एजेंडे पर काम करने लगी है। वह राज्य सरकार के विकास कार्यों में रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रही है, ताकि कल कह सके कि राज्य सरकार ने कोई काम नहीं किया।

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झामुमो ने राज्यपाल पर सवाल उठाए। कहा कि काउसिंल की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं, लेकिन उनका आदिवासी होना भी उतना ही जरूरी है। पिछले पांच साल तक गैर आदिवासी काउंसिल की अध्यक्षता करते रहे, इस पर कभी राज्यपाल ने आपत्ति क्यों नहीं की।

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