केके पाठक खलनायक या नायक, सबसे विवादित IAS का पद छोड़ना तय

केके पाठक खलनायक या नायक, सबसे विवादित IAS का पद छोड़ना तय। आज उनकी छुट्टी खत्म। काम पर लौटने के बजाय छुट्टी बढ़ाई। जानिए पूरा किस्सा।

शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक की 17 जनवरी को छुट्टी समाप्त हो गई, लेकिन वे काम पर नहीं लौटे और अपनी छुट्टी बढ़ा दी। वे 30 जनवरी तक छुट्टी पर रहेंगे।

केके पाठक राज्य के सबसे चर्चित आईएएस अधिकारी हैं। उनके निर्णय, आदेश और कार्यशैली से शिक्षा विभाग में बड़े बदलाव दिखे। अनेक लोग उन्हें इसीलिए नायक के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनके कई निर्णय विवादास्पद रहे, विरोध हुए और उन्हें तानाशाह अधिकारी कहा गया।

शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक का पहला विवाद विभाग के मंत्री चंद्रशेखर के साथ हुआ। मंत्री के निजी सचिव ने केके पाठक को कई पत्र लिखे, लेकिन सचिव उन सुझावों के बदले खुद निर्णय लेते रहे। बाद में उन्होंने मंत्री के निजी सचिव को विभाग में प्रवेश करने पर रोक लगी दी। उन्हें मुख्य सचिव का भी साथ मिला। मुख्य सचिव ने आदेश जारी किया कि किसी मंत्री के कोई निजी सचिव विभाग के सचिव को पत्र नहीं लिख सकते। मामला राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के पास पहुंचा, लेकिन उन्होंने भी मंत्री को समझाया कि अधिकारी से विवाद ठीक नहीं है।

केके पाठक ने इस दौरान सौ से अधिक आदेश और पत्र जारी किए। शिक्षा में सुधार के लिए कई कदम उठाए। शिक्षकों को समय पर आने, समय पर जाने और स्कूल में बच्चों को पढ़ाने पर मजबूर कर दिया। बहुत हद तक मनमानी रुकी। शाम को वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के जरिये अटेंडेंस बनने लगा। जिला शिक्षा अधिकारी को जिम्मेदारी दी कि वे लगातार स्कूलों का निरीक्षण करे। उनका एक निर्णय बहुत अच्छा था। उन्होंने जिलाधिकारियों को आदेश दिया कि वे अच्छे शिक्षकों की पहचान करें और स्कूल अवधि समाप्त होने के बाद मेडिकल-इंजीनियरिंग की तैयारी कराएं। इससे बच्चे कोचिंग के जाल में फंसने से बच जाएंगे। ऐसे शिक्षकों को अतिरिक्त मानदेय देने का भी आदेश दिया।

केके पाठक ने छात्रों के हित में कई कदम उठाए। पढ़ाई में कमजोर छात्रों के लिए एक्स्ट्रा क्लास की व्यवस्था करने का आदेश दिया।

उनके कई निर्णय विवादास्पद भी रहे। उन्होंने आंबेडकर विवि के वाइस चांसलर का वेतन रोक दिया। इसे राज्यपाल ने हस्तक्षेप माना। राज्यपाल पदेन चांसलर होते हैं। केके पाठक के निर्णय से राजभवन के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई। राज्यपाल ने केके पाठक के निर्णय को पलट दिया। पाठक ने शिक्षकों के संघ बनाने पर रोक लगा दिया। इसे भी तानाशाही भरा कदम माना गया। उन्होंने एक विधान पार्षद संजय सिंह की पेंशन पर रोक लगा दी। इससे कई विधान पार्षद नाराज हो गए और वे शिकायत लेकर मुख्यमंत्री के पास भी गए। ऐसे लोग केके पाठक में तानाशाही प्रवृत्ति देखते हैं।

इतना तो तय है कि केके पाठक दशक के सबसे ज्यादा चर्चित अधिकारी हैं। अगर विभाग से वे हटते हैं, तो देखना होगा कि विभाग की कमान किस अधिकारी को दी जाती है।

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