भूमि सर्वे में हाथ डाल कर नीतीश सरकार फंस गई है। इसी भूमि सर्वे के कारण तेलंगाना और आंध्र की सरकारें चली गईं। सर्वे से बढ़ते तनाव को देखते हुए नीतीश सरकार ने एक तरह से हाथ पीछे खींच लिए हैं। दो दिन पहले उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कह दिया कि जमीन सर्वे के लिए कोई डेडलाइन नहीं है। यह चलता रहेगा। जबकि खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 3 जुलाई को कहा था कि अगले साल जुलाई तक यानी जुलाई, 2025 तक जमीन सर्वे का काम पूरा कर लेना है। इस आशय का आदेश भी उन्होंने दिया था। अब खुद मुख्यमंत्री चुप हैं और उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के जरिये अपनी बात वापस ले ली। भूमि सर्वे में इतने पेंच हैं कि लोग परेशान हैं। लोग दूसरे जिले, दूसरे प्रदेश से अपने गांव पहुंच रहे हैं, लेकिन कोई काम नहीं हो रहा है। कार्यालयों में लोग कागज लेकर दौड़ रहे हैं, पर कोई काम नहीं हो रहा है। इससे सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ रही है। लगता है इसी फीडबैक के बाद नीतीश सरकार ने जमीन सर्वे से हाथ खींच लिए हैं।
भूमि सर्वे में हाथ डाल कर नीतीश सरकार बुरी तरह फंस गई है। अगर वह सर्वे के काम को स्थगित करने की घोषणा करे, तो सवाल उठेगा कि बिना तैयारी के शुरू ही क्यों किया गया। लोग इतने परेशान हुए, सो अलग। सरकार की फजीहत न हो, इसलिए सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री की बात को पलट दिया और कहा कि भूमि सर्वे 2025 के बाद भी चलता रहेगा।
उधर नीतीश सरकार के पास तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश का अनुभव भी है। तेलंगाना में केसीआर तथा आंध्रे में जगन सरकार के बुरी तरह चुनाव हारने के पीछे बड़ी वजह भूमि सर्वे को बताया जा रहा है। भूमि सर्वे तो नहीं हुआ, लेकिन जनता परेशान हो गई और सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी, जिसका परिणाम रहा कि दोनों प्रदेशों की सत्ताधारी पार्टियों को सत्ता से बाहर होना पड़ा।
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उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान के बाद सरकारी महकमे को इशारा समझ में आ गया है, इसलिए वे भी अब निश्चिंत हो गए हैं। अब माना जा रहा है कि अगले साल विधानसभा चुनाव के बाद ही भूमि सर्वे पर विचार होगा कि इसे सचमुच जारी रखना है या कागजों में जारी रखना है।