मिथिल के उदाहरण से नवरात्रि में मीटबंदी की बहस को नया आयाम

मिथिल के उदाहरण से नवरात्रि में मीटबंदी की बहस को नया आयाम

महंगाई से ज्यादा चर्चा नवरात्रि में मांस की बिक्री पर पर रोक की है। लहसुन-प्याज पर प्रतिबंध की चर्चा भी है। अब मैथिल ब्राह्मणों के तर्क से पूरी बहस हवा हुई।

देश में महंगाई, बेरोजगारी से ज्यादा चर्चा नवरात्रि में मांस की दुकानों को बंद कराने, मांसाहार पर रोक लगाने की हो रही है। बात बढ़ते-बढ़ते लहसुन-प्याज तक आ गई है। क्या भविष्य में लहसुन-प्याज की दुकान बंद कराते भी खास दल के समर्थक नजर आएंगे?

वैसे पूरी बहस में मिथिला के ब्राह्मणों के उतरते ही मांसाहार विरोधी जमात बगलें झंकने लगी है। लेखक अशोक कुमार पांडेय ने लिखा-आप नवरात्रि में मांसाहार नहीं करते। लेकिन बंगाल में नवरात्रि के पंडालों में मटन-मछली सब मिलता है। संस्कृति बहुल देश है। अगर केवल हिंदुओं की बात करें तो खान-पान वगैरह सबकी विविधता है। लेकिन उत्तर भारत के कथित सवर्णों को लगता है बस सब उन्हीं के हिसाब से होना चाहिए।

इसके बाद मिथिला के मूल निवासी और पत्रकार पंकज चौधरी ने कहा-सर , हमलोग मिथिला के ब्राह्मण हैं ….और नवरात्र में हमारे यहाँ मांसाहार चलता है …अष्टमी नवमी को खास तौर पर … शिवरात्रि में कश्मीर ब्राह्मण के यहाँ मीट का प्रिपरेशन देख कर आप हैरत में पड़ जाएंगे…. यही विविधता है हिन्दू धर्म की … Hinduism is a way of life.

सोशल मीडिया पर एक ने लिखा-सब समझ आती है, जान बूझ कर नौटंकी करते है खबर में आने के लिए और माहौल गर्म रखने के लिए।प्रशासन का पूरा समर्थन रहता है इसलिए इतना गरजते है। प्रशासन अपनी नौकरी ईमानदारी से करे ये सब टाइट हो जाएं। खैर जनता तो चाहती है बस अब्दुल टाइट रहे सब सह लेंगे।

दक्षिणी दिल्ली के मेयर मुकेश सूर्यन ने एएनआई से कहा कि नवरात्रि में 99 प्रतिशत हिंदू लहसुन-प्याज नहीं खाते। उनके इस बयान के बाद यह चर्चा भू शुरू हो गई कि क्या भविष्य में लहसुन-प्याज पर भी रोक लगेगी। तो क्या करेंगे प्याज उपजानेवाले किसान और अनेक रोगों में लहसुन रामबाण है। लहसुन पर रोक लगी, तो का घरेलू इलाज बंद हो जाएगा।

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