नीतीश नंबर में जीते, लेकिन उनकी सियासत अब भाजपा के रहम पर

नीतीश नंबर में जीते, लेकिन उनकी सियासत अब भाजपा के रहम पर

नीतीश नंबर में जीते, लेकिन उनकी सियासत अब भाजपा के रहम पर। विपक्ष भले ही नंबर नहीं जुटा पाया, पर हौसले बुलंद। जानिए नीतीश जल्द ही किस संकट में फंसेंगे।

इर्शादुल हक, संपादक, नौकरशाही डॉट कॉम

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विश्वास मत भले जीत गए हों, पर उनकी सियासत बुरी तरह फंस गई है। उन्होंने नंबर साबित कर दिया, लेकिन इस जीत के बाद अब वे पूरी तरह भाजपा पर निर्भर हो गए हैं। उनकी आगे की राजनीति भाजपा के रहम पर होगी। नीतीश कुमार नंबर में जीते, पर विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे पाए और न ही भाजपा से खुद को भारी दिखा पाए।

सवाल है कि भाजपा नीतीश कुमार पर क्यों रहम करेगी। भाजपा का एक निर्णय देखिए। पार्टी ने दो नेताओं को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाया है। एक भीम सिंह हैं और दसूरी धर्मशीला गुप्ता हैं। दोनों अतिपिछड़ी जाति से आते हैं। इससे भाजपा की रणनीति समझी जा सकती है। एक दौर था, जब नीतीश कुमार पिछड़ों तथा अतिपिछड़ों को राज्यसभा भेजते थे और भाजपा सवर्ण को। लेकिन अब भाजपा पिछले वर्षों से नीतीश कुमार के अतिपिछड़े आधार में सेंध लगाने के प्रयास में जुटी है। भीम सिंह तथा धर्मशीला गुप्ता को प्रत्याशी बनाना उसी की कड़ी है।

बिहार में सोमवार को हुए फ्लोर टेस्ट के बाद सियासत में नीतीश कुमार के लिए स्पेस पहले से कम हुआ है। पूरे फ्लोर टेस्ट में मुख्य मुकाबला भाजपा और राजद के बीच ही रहा। नीतीश कुमार अपना एजेंडा सेट करते नहीं दिखे। भाजपा सदस्य लगातार जयश्री राम का नारा लगाते रहे। इधर तेजस्वी यादव भाजपा पर हमले करते रहे। नीतीश कुमार 18 साल पहले की बात करते रहे, जिसमें नया कुछ नहीं था।

नीतीश कुमार के सामने तुरत दो संकट आनेवाले हैं। पहला, मंत्रिमंडल का विस्तार करना है। अब तक वे सरकार किसी की हो, सारा निर्णय नीतीश कुमार उनका मुख्यमंत्री सचिवालय करता था। अब वे सरकार पर वह नियंत्रण नहीं रख पाएंगे। भाजपा के दो उपमुख्यमंत्री इशारा कर चुके हैं। नीतीश कुमार के सामने दूसरा संकट लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के मामले में आने वाला है। नीतीश कुमार अब जिस प्रकार भाजपा पर निर्भर हो गए हैं, उसमें उनके लिए भाजपा से बराबर सीटों की मांग करना संभव नहीं होगा। हो सकता है, भाजपा उनकी सीटें कम कर दे। 2019 में जदयू और भाजपा 17-17 सीटों पर चुनाव लड़े थे। इस बार जदयू की सीटें कम हो सकती है।

और असली खेल तो लोकसभा चुनाव के बाद होगा। भाजपा जिस प्रकार नीतीश कुमार के जनाधार को अपनी तरफ खींच रही है, वह नीतीश के लिए अस्तित्व का प्रश्न बनाएगा।

एक तीसरे पक्ष पर भी गौर करना जरूरी है। एनडीए गठबंधन में बड़े भाई वाला रुतबा खोने के बाद और खास कर अपना राजनीतिक एजेंडा भी न रहने पर नीतीश कुमार के लिए अपनी पार्टी के नेताओं को एकजुट बनाए रखना मुश्किल होगा।

आज भी तेजस्वी यादव ने पूछा कि दशरथ ने जब राम को वनवास भेजा, तो उसके पीछे कैकेयी थी। दशरथ को उसने मजबूर कर दिया। आपको किसने मजबूर किया। इस बार पाला बदलने की कोई ठोस वजह नीतीश कुमार नहीं बता पाए। इसीलिए उनकी छवि को भारी झटका लगा है। प्रतिष्ठा घटी है। एक तरफ नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा घटना तथा दूसरी तरफ भाजपा और तेजस्वी यादव का मजबूत होना, जदयू के लिए अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। आज की तारीख में नीतीश कुमार लड़ते हुए नहीं दिख रहे हैं। वे थके हुए लग रहे हैं।

विश्वास मत : पूरे भाषण में बेपटरी दिखे नीतीश कुमार