Pegasus भूचाल, राहुल का आया नाम, क्या तेजस्वी भी थे निशाने पर

Pegasus भूचाल, राहुल का आया नाम, क्या तेजस्वी भी थे निशाने पर

ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने नया खुलासा किया है। Pegasus मामले में राहुल गांधी का फोन भी टेप करने की हुई कोशिश। क्या तेजस्वी भी थे निशाने पर?

Pegasus मामला थमने के बजाय नया भूचाल लेकर आ गया। द वायर और द गार्डियन के अनुसार कांग्रेस नेता राहुल गांधी के फोन में भी इजराइली सॉफ्टवेयर डालने की कोशिश की गई। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन लिखता है- प्रधानमंत्री मोदी के प्रमुख विरोधी राहुल भी निशाने पर थे। अखबार ने सीधे मोदी सरकार का नाम लेकर लिखा है कि उनके विरोधी जिन सैकड़ों लोगों की जासूसी के लिए नाम तय किए गए थे, उनमें राहुल गांधी भी थे। राहुल की जासूसी के लिए दो बार नाम तय हुआ।

अखबार लिखता है कि प्रधानमंत्री मोदी को 2019 चुनाव में चुनौती देनेवाले राहुल गांधी के दो नंबर सेलेक्ट किए गए थे। यह चुनाव से पहले की बात है। अखबार ने यह भी लिखा है कि राहुल गांधी के पांच करीबी कांग्रेस नेताओं के फोन नंबर भी जासूसी के लिए सेलेक्ट किए गए थे। यह पूरा डेटा गैर-व्यावसायिक मीडिया संगठन फॉरबिडेन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इकट्ठा किए हैं और उसने द गार्डियन, द वायर सहित कुछ अन्य अखबारों से शेयर किए। राहुल गांधी हर महीने-दो महीने पर अपना फोन बदल देते हैं, ताकि उनके फोन की जासूसी नहीं हो सके।

मालूम हो कि पेगासस प्रोजेक्ट का यह खुलासा अभी शुरुआती है। यह कई किस्तों में सामने आएगा।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या तेजस्वी यादव का नाम और नंबर भी जासूसी के लिए पोटेंशियल सूची में था? एक बात स्पष्ट है कि फोन में सॉफ्टवेयर डालकर जासूसी करने के लिए वे ही लोग निशाने पर थे, जो मोदी सरकार के मुखर विरोधी रहे हैं। तेजस्वी यादव ऐसे नेता हैं, जो भाजपा विरोधी मतों को एकजुट करने के लिए बंगाल से लेकर असम तक गए। सभाएं कीं। तो क्या उनका भी नाम जासूसी वाले लिस्ट में था ? मीडिया में चर्चा है कि नए खुलासे में तेजस्वी का नाम भी आ सकता है। चर्चा प्रशांत किशोर के नाम की भी है, क्योंकि वे भाजपा के खिलाफ प्रमुख रणनीतिकारों में एक हैं।

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इजराइली जासूसी सॉफ्टवेयर इतना खतरनाक है कि आपके न चाहते हुए भी आपका नंबर और आपकी सारी बातचीत रिकार्ड हो सकती है। आपके ई-मेल में भी यह प्रवेश कर सकता है। कई संगठनों ने दावा किया है कि कोरेगांव मामले में जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ ऐसा ही हुआ। लेकिन सरकार ने जांच नहीं कराई। अगर यह जांच पहले की गई होती, तो इजराइली जासूसी का मामला पहले ही उजागर हो जाता। दूसरी बात यह कि कंपनी का कहना है कि वह सॉफ्टवेयर केवल सरकारों को ही बेचती है, इसलिए लोग सीधे प्रधानमंत्री मोदी से सवाल कर रहे हैं। वे बताएं कि सरकार की किस एजेंसी ने जासूसी करवाई। विभिन्न संगठनों ने स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच की मांग की है।

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