त्वरित टिप्पणी: मांझी को दीजिए 21कलमों{ तोप नहीं} की सलामी

मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने साबित कर दिया है कि दिलतों को किसी के रहम की जरूरत नहीं, उन्होंने जता दिया है कि दलितों का दलन दलित बर्दाश्त नहीं कर सकतेmanjhi

अभिरंजन कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

एक मुख्यमंत्री के तौर पर जीतनराम मांझी कामयाब रहे हैं या नाकाम, इसपर डिबेट हो सकता है, क्योंकि कामयाबी का संबंध अनुभव से भी है और पार्टी, मंत्रिमंडलीय साथियों और ब्यूरोक्रेसी से मिल रहे सहयोग-असहयोग से भी है, लेकिन इस बात के लिए उन्हें सलामी दी जानी चाहिए कि बिहार में दलितों का माथा उन्होंने ऊंचा किया है।

उन्होंने साबित कर दिया है कि दलित कमज़ोर नहीं होते। वे अपने वाजिब सम्मान और स्वाभिमान के लिए किसी से भी टकरा सकते हैं।

मांझी ने आज उन तमाम लोगों को करारा जवाब दिया है, जो अपने स्वार्थ के लिए अब तक दलितों-महादलितों का इस्तेमाल करते रहे। उन्होंने हमें बताया है कि बहुत हो चुका। अब अगर दलितों का दलन करोगे, तो वह नहीं सहेगा। दलित रबड़-स्टाम्प नहीं है किसी का। दलितों को आपके लॉलीपॉप की ज़रूरत नहीं है। उसे अधिकार चाहिए, भीख नहीं चाहिए।

 

एक बात और। मांझी जो इतना दम-खम दिखा रहे हैं, वह अकेले उनका दम-खम नहीं है। यह बिहार के तमाम दलितों का दम-खम है। इसलिए आज के दिन बिहार के हमारे सारे दलित भाई-बहन भी सलामी के हकदार हैं। तोपों की सलामी देने में तो मैं यकीन रखता नहीं, इसलिए मुख्यमंत्री मांझी और बिहार के अपने तमाम दलित भाइयों-बहनों को मेरी तरफ से 21 कलमों की सुपरहिट सलामी।

 

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