दक्षिणपंथी तानाशाही के खात्मे के लिए अंकगणित के साथ सामंजस के रसायन पर भी ध्यान दे विपक्ष

 राजनीतिक रणनीतिकार संजय यादव अपने लेख में बता रहे है कि दक्षिणपंथी तानाशाही राजनीति को परास्त करने के लिए आकार ले रहे महागठबंधन के लिए सिर्फ अंकगणित ही नहीं बल्कि सहयोगी दलों के बीच सामंजस का रसायन भी जरूरी है.

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संजया यादव बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार हैं

यह याद रखने की बात है कि यह लालू प्रसाद ही हैं जिन्हें इस बात का सबसे पहले आभास हो गया था कि दक्षिणपंथी तानाशाही राजनीति को पस्त करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त गठबंधन की जरूरत है.

 

जब 2014 लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने और तब राजनीतिक पंडित इस चुनाव परिणाम का विश्लेषण कर रहे थे. तभी लालू प्रसाद ने इस बात पर जोर दिया था कि सेक्युलर और समाजवादी पृष्ठभूमि की पार्टियों की एकता जरूरी है. दूसरी ही सुबह जब लालू प्रसाद उस चुनाव परिणाम पर मंथन कर रहे थे तो उनके पास यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी का फोन आया.

 

लालू ने उनसे लम्बी बातचीत की. इस दौरान लालू प्रसाद ने सोनिया का हौसला बढ़ाते हुए कहा- “मैडम चिंता करने की बात नहीं है. हम सब मिल कर संघ-भाजपा की इस शक्ति को ध्वस्त करेंगे. जीत हमारी होके रहेगी. हमारे सामने चुनाव परिणामों का पूरा आंकड़ा है जिससे साफ पता चलता है कि हमारे वोट बंट गये और उनका वोट पोलराइज्ड हो गया इसलिए वे जीत गये.बस जरूरत इस बात की है कि हम अपने निहित स्वार्थों को दरकिनार करके आगे बढ़ना होगा”.

 

इस चुनाव परिणाम के महज दो महीने बाद राज्यसभा व विधानसभा उपचुनावों के अवसर पर जेडीयू, कांग्रेस और राजद की एकता सामने आयी और उसका परिणाम भी सकारात्मक रहा. उसके बाद जब 2015 के विधानसभा चुनाव की बारी आयी तो भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. विधानसभा चुनाव का यह नतीजा दुनिया ने देखा.

 

यह एकता जुलाई 2017 तक बनी रही लेकिन अप्रत्याशित रूप से नीतीश कुमार ने पलटी मारी और भाजपा के साथ हो लिये. इतिहास इस बात का गवाह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद लालू प्रसाद की अगुवाई में ही गठबंधन ने आकार लिया जिससे भाजपा के विजयी रथ को बिहार में रोका जा सका. लेकिन 2017 के जुलाई में नीतीश ने उस जनादेश का अपमान किया और फिर भाजपा की गोद में जा बैठे.

 

आज एनडीए के शासन काल में बिहार समेत पूरे देश की हालत पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि घोटालों पर घोटाले, दंगा, अपराध, यौनउत्पीड़न, गैगरेप, अपहरण, हत्या और भीड़ के हाथों कत्ल की वारदात एक आम बात हो गयी है.

 

दूसरी तरफ  बिहार में डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद बिहार में विकास से जुड़ा कोई बड़ा प्रोजेक्ट सतह पर नहीं आ पा रहा है. इतना ही नहीं जिन परियोजनाओं की घोषणा पहले की जा चुकी है वो भी लंबित हो रही हैं. राज्य के केंद्रीय मंत्रियों के कथित प्रयास के बावजूद केंद्र बिहार को समुचित फंड मुहैया भी नहीं करा रहा है. हकीकत तो यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बिहार को स्पेशल पैकेज देने की बात भी जुमला साबित हो चुकी है.

 

बिखरता एनडीए, सशक्त होता महागठबंधन

वहीं दूसरी तरफ एनडीए के अहंकार का नतीजा है कि नीतीश कुमार की घर वापसी के बाद पूर्वमुख्यमंत्री जीतन राम मांझी एनडीए छोड़ कर राजद के महागठबंधन का हिस्सा बन चुके हैं. वहीं नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा सरीखे बड़े नामों के बावजूद भाजपा को हालिया उपचुनावों में बुरी तरह शिकस्त का सामना करना पड़ा है. इन उपचुनावों में तेजस्वी यादव ने, लालू प्रसाद के मशाल को मजबूती से थामा है और वह जनता के सामने मजबूती से लोकप्रिये हो रहे हैं. जिसका नतीजा है कि राजद का जनाधार गरीबों, पिछड़ों और अन्य कमजोर वर्गों में मजबूत होता जा रहा है.

 

उधर पूरे देश भर में और खास कर भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर लगातार बढ़ते अत्याचार, अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण एक्ट को कमजोर करने के कारण इन समुदायों का रुझान सामाजिक न्याय में विश्वास रखने वाली पार्टियों की तरफ तेजी से बढा है. बिहार में स्वाभाविक रूप से इन समूहों का विश्वास राजद की तरफ और मजबूत हुआ है.

 

 

अगर कोई 2014 के चुनाव परिणाम पर गहराई से नजर दौड़ाये तो पायेगा कि राजद ने हार के बावजूद भाजपा को तमाम सीटों पर कड़ा टक्कर दिया था और भाजपा से उसके प्रत्याशियों की हार का मार्जिन काफी कम था. यह हालत तब थी जब अनेक सीटों पर जदयू ने सेक्युलर वोटों को बांटने के उद्देश्य से कई मुस्लिम प्रत्याशी खड़े कर दिये थे.

 

विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं नीतीश

 

लेकिन 2017 में नीतीश द्वरा राजद के साथ की गयी धोखेबाजी के बाद हालात एकदम बदल गये हैं. कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यक वर्गों का विश्वास नीतीश कुमार से पूरी तरह उठ चुका है. दूसरी तरफ डेढ़ दशक तक शासन में रहने के कारण नीतीश कुमार एंटि एंकम्बेंसी के खतरों से भी जूझ रहे हैं. साथ ही सत्ता के लिए अलग-अलग विचारधारा की पार्टियों के साथ दोस्ती करने के नीतीश की कारिस्तानी ने उन्हें एक अवसरवादी और मौकापरस्त नेता की पहचान दे दी है.

 

दरियादिली दिखाये कांग्रेस

अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं जिससे यह लगने लगा है कि राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए के खिलाफ एक महागठबंधन आकार लेने लगा है. और कहना ना होगा के ऐसे हालात में यह कांग्रेस ही है जो एनडीए के खिलाफ बनने वाले गठबंधन के लिए बड़ी पहले कर सकती है. यह इसलिए भी जरूरी है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है. हालांकि इसके लिए कांग्रेस को दरियादिली दिखानी होगी और उसे आम लोगों और रिजनल पार्टीज की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा.

 

कांग्रेस को दरियादिली इसलिए भी दिखानी होगी क्योंकि उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे बड़े प्रेदेशों में उसका कोई मजबूत जनाधार नहीं है. लिहाजा इस प्रस्तावित गठबंधन के नेतृत्व की कमान अन्य दलों के साथ मिल कर तय किया जा सकता है. देश के सेक्युलर और समाजवादी आदर्शों की रक्षा के लिए कांग्रेस को अलग-अलग राज्यों के दलों को आगे करना होगा ताकि भाजपा के खिलाफ आक्रमण को मजबूत बनाया जा सके. कांग्रेस को यह समझना होगा कि राइटविंग तानाशाही को परास्त करने के लिए उसे मजबूत पहल करनी होगी और इसके लिए उसे  क्षेत्रीय दलों को बाहें खोल कर स्वागत करना होगा.

इतिहास से सबक

 

कहा जाता है कि हमें अपनी कमजोरियों से सबक लेना चाहिए. कांग्रेस को भी ऐसा सबक लेना चाहिए और उसे इस उदाहरण को पेशे नजर रखना चाहिए कि कैसे भाजपा ने तमाम विरोधाभासों के बावजूद कैसे दिगर पार्टियों के साथ गठबंधन बनया है. भाजपा ने बिहार में जदयू, पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना को मोर्चे की कमान सौंपी थी. कांग्रेस को भी ऐसी ही रणनीति विभिन्न प्रदेशों में अपनानी होगी.

 

यह उदाहरण भी कांग्रेस को अपने सामने रखना चाहिए कि कैसे  2009 के लोकसभा चुनाव और 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव भाजपा ने जदयू के कंधों पर बैठ कर ही लड़ा था और धीरे-धीरे वह मजबूत होती गयी थी.

 

संतोष की बात है कि राहुलगांधी  के नेतृत्व वाली कांग्रेस रिजनल दलों के सेंटिमेंट और उनके मतदाताओं की भावनाओं को समझती है.

 

कामयाब गठबंधन का रसायन शास्त्र

रिजनल पार्टीज में वह दमखम है जो वे अपने मतदाताओं के वोट कांग्रेस को ट्रांस्फर करा सकती हैं. राष्ट्रीय पार्टियों की अपनी सीमायें हैं. वह प्रादेशिक मुद्दों की प्राथमिकताओं का समाधान समुचित तरीके से नहीं खोज सकतीं, जितनी रिजनल पार्टीज समझती हैं.ऐसे में राष्ट्रीय दल को स्थानीय दलों का भरोसा जीतना ही होगा. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी अलग-अलग सीमायें हैं. लिहाजा एक कामयाब गठबंधन के लिए इन बातों पर जरूर ध्यान देना होगा.

पिछे की बातें पढ़ें-  महागठबंधन में थमते विवाद: आइए समझें राजद, जद यू व मीडिया- किसकी क्या थी रणनीति

 

हिंदी प्रदेशों को छोड़ दें तो कांग्रेस, भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विक्लप के रूप में सामने आने की शक्ति रखती है. जबकि बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में उसे बस बढिया प्रदर्शन करने की जरूरत है. वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय पार्टियों को भी यह स्वीकार करना होगा कि सफल गठबंधन के लिए राष्ट्रीय पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है. ऐसे में गठबंधन के हर दल को भाजपा को परास्त करने के बड़े उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनी वचनबद्धता पर कायम रहना होगा तभी महागठबंधन( या जो भी इस गठबंधन का नामाकरण हो) भाजपा के खिलाफ कड़ी चुनौती पेश कर पायेगा.

इन्हीं बुनियादी बातों को ध्यान में रखते हुए अब यह समय सबसे उचित है कि  एक मजबूत गठबंधन को आकार दिया जाये. ऐसी कोशिश करते समय यह भी ध्यान रखना होगा की तमाम दल अपने निजी स्वार्थों का त्याग करें.

 

यह ध्यान रखने की बात है कि दक्षिणपंथी तानाशाही के खिलाफ जीत हासिल करने के लिए सिर्फ अंकगणित ही नहीं बल्कि आपसी सामंजस का रसायन भी काफी जरूरी है.

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