नीतीश का सफर

दशकों से नीतीश कुमार की राजनीतिक गतिविधियों में साथ रहे  डा. भीम सिंह उनके राजनीतक सफर पर रौशनी डालते हुए बता रहे हैं कि नीतीश कुमार की भूमिका को इतिहास सम्मान से याद करेगा

भीम सिंह: नीतीश के सफर का साथी

भीम सिंह: नीतीश के सफर का साथी

 

श्री नीतीश कुमार तकनीकी शिक्षा प्राप्त सुलझे हुए नेता हैं जिन्होंने लोहियावादी राजनीति को अपनाते हुए राजनीति में कदम रखा और सन 1974 के छात्र आन्दोलन में अपनी राजीतिक सक्षमता के बल पर राज्य की राजनीति में पहचान बनायी।

जननायक कर्पूरी ठाकुर की सन 88 में मृत्यु के बाद श्री लालू प्रसाद और श्री नीतीश कुमार ने उनके उतराधिकारी के रूप में अपनी पहचान बनायी जिसमे मेरे जैसे हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी सहयोग है। 10 मार्च 1990 को श्री लालू प्रसाद को बिहार का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लालू जी के बाद नीतीश जी ही तत्कालीन बिहार जनता दल में दूसरे नम्बर के नेता के रूप में मान्यता थी। परन्तु कालान्तर में कतिपय कारणों से मतभेद उत्पन्न हो गये।
मतभेदों के कारण तत्कालीन जनता संसदीय दल में विभाजन हो गया और श्री जार्ज फ़र्नान्डिस तथा श्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में 21 जून 1994 को जनता दल( जार्ज) का गठन हुआ।28जुलाई2994 को श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल पटना में प्रथम कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ। 19 अक्तूबर 1994 को पटना के गांधी मैदान में इस नये गुट की विशाल रैली हुई जिसमें इस गुट का नामकरण समता पार्टी के रूप में हुआ।

समता पार्टी का सफर
समता पार्टी को राजनीतिक प्रेक्षकों ने लालू जी के लिए गम्भीर चुनौती मानी। लालू जी ने, जो तब तक बिहार की राजनीति में अपराजेय योद्धा के रूप में अपना रुतबा बना चुके थे, ने भी समता पार्टी को अपने लिए गम्भीर चुनौती मानी। समता पार्टी ने वाम झुकाव दर्शाते हुए CPI(ML) के साथ सीमित समझौता किया और पुरे तामझाम के साथ 1995 के विधान सभा चुनाव में भाग लिया परन्तु उसे असफलता का सामना करना पड़ा। उसे मात्र 7 सीटों से ही संतोष करना पड़ा।विदित हो की उस चुनाव में आनंद मोहन की बिपिपा भी बड़ी जोशो खरोश से उतरी थी परन्तु उसे औंधे मुंह गिरना पड़ा था।  समय की नजाकत को देखते हुए 30 जनवरी 1996 को बिपिपा ने अपनी पार्टी के समता पार्टी में विलय की घोषणा कर दी।बाद में चन्द्रशेखर जी की सजपा से भी समता पार्टी की सीमित दोस्ती हुई। इस प्रकार समता पार्टी ने अपने को फिर मजबूत कर लिया।
भाजपा का साथ

परस्पर आवश्यकता को देखते हुए 1996 में समता पार्टी और भजपा में समझौता हुआ। भाजपा से समझौता के कारण समता पार्टी को रवि राय,मो श्हाबुदीन, चन्द्रजीत यादव, मोहन सिंह सरीखे कई महत्वपूर्ण नेताओं का साथ छूट गया। उन्होंने समता पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया।1996 लोकसभा चुनाव में समता -भजपा गठबंधन को उत्साहजनक सफलता मिली। देश के लोगों को पहली बार लगा कि लालू अपराजेय नहीं हैं। बिहार के लोंगों ने नीतीश कुमार में अपना भविष्य देखना प्रारम्भ कर दिया। यहाँ यह उल्लेख कर देना अप्रासान्गिक नहीं होगा कि चाहे बिपिपा हो, चाहे सजपा हो, चाहे भजपा सभी ने अंतर्मन से और राजनीतिक रूप से नीतीश कुमार को ही बिहार का नेता माना था और हर चुनाव में जनता के बीच जाते रहे थे।

कायापलट
समता पार्टी का भाजपा से समझौता कतिपय शर्तों के आधार पर था कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवाद दोनों पक्षों की सहमति से या कोर्ट के फैसले से होगा, कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात नही होगी, कि संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने की बात नहीं होगी। भाजपा जबतक इन वचनों पर कायम रही तब तक गठ्बन्धन अच्छे ढंग से चलता रहा। श्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में अनेक सफलताएँ मिलीं। बिहार में सुशासन स्थापित हुआ। राज्य में न्याय के साथ विकास हुआ। बिहार और बिहारवासियों को देश के दूसरे हिस्सों में सम्मान की नजरों से देखा जाने लगा। बिहार देश का सबसे तेजी से विकास करने वाला राज्य बन गया। लाखों की तायदाद में लोग मुख्य धारा में लौट गये।हिंसा-प्रति हिंसा का दौर समाप्त हुआ तो लोग चैन की नींद सोने लगे।
लेकिन मानव स्वभाव है कि जब पेट भर जाता है तब मन कुलबुलाने लगता है। यह कुलबुलाहट अच्छे के लिए भी हो सकता है और बुरे के लिए भी। बुराई की ओर झुकाव तेजी से होता है बनिसबत अच्छाई के। भाजपा के लोगों ने भी जदयू के साथ विस्वासघात किया। उसने विवादित मुद्दों को फिर अपना राजनीतिक कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया। एक विवादित नेता को सामने लाना प्रारम्भ कर दिया। बिहार का गुणगान भी भाजपा नेताओं को बुरा लगने लगा। ऐसी परिस्थिति में जदयू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया।
भाजपा से नाता तोडना जदयू और नीतीश कुमार का सैद्धांतिक व राजनैतिक फैसला था। किसी उत्तेजनावश लिया गया फैसला नहीं था।और न लाभ-हानि का आकलन कर लिया गया. यह कोई व्यापारिक फैसला भी नहीं था।इस फैसले के तहत जदयू ने भाकपा से समझौता किया और लोकसभा चुनाव में उतरा।
जदयू बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहा था। हम नीतीश कुमार की उपलब्धियों के आधार पर वोट मांग रहे थे। बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा भी हमारा मुद्दा था। नीतीश कुमार अपने काम की मजदूरी मांग रहे थे।परन्तु हमें बुरी तरह पराजय का मुंह देखना पड़ा।
विदित हो कि बिहार विधान सभा में नीतीश कुमार की सरकार को कोई खतरा नही था। सरकार को स्पष्ट बहुमत है। फिरभी नीतीश कुमार ने पराजय की जिम्मेवारी लेते हुए मुख्य मंत्री पद से त्याग कर दिया। राजनीति में त्याग का ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता है।इस्तीफा वापस लेने के लिए विधायकों ने एक स्वर से दबाब डाला परन्तु उन्होंने विनम्रतापूर्वक अनुरोध को अस्वीकार कर यह साबित कर दिया कि उनका पद त्याग नौटंकी या इमोशनल ब्लैकमेल करना नही था, जैसा कि भजपा वाले कह रहे थे,अपितु एक दृढ़ नैतिक फैसला था।उनकी इस कार्रवाई को भारतीय राजनीति में आदर के साथ याद किया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*