भाजपा की कार्पोरेट तानाशाही के खिलाफ बिगुल न बन जाये शत्रु की ‘खामोश’

शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी ” एनीथिंग बट -खामोश ” ने वाकई बीजेपी को खामोश कर दिया है । पुस्तक विमोचन की छोटी सी घटना ने बीजेपी के भीतर के कुलबुलाते सत्य को एक बार फिर सतह पर ला दिया ।anything.but.khamosh

भारती कुमारी

इस खामोश अवसर पर शत्रु के दिलखोल वाचालपन ने बीजेपी के वर्तमान को तो उघाड़कर रख ही दिया , भविष्य का भी एक बड़ा संकेत दे गया । समारोह में जुटे शीर्ष नेताओं आडवाणी और यशवंत सिन्हा सरीखों की उपस्थिति और यशवंत सिन्हा का यह कटाक्ष की अगर शत्रु को पार्टी से निकाला गया तो वो पाकिस्तान पीपल पार्टी ज्वाइन कर लेंगे , बहुत कुछ कह गया ।

समय के इंतजार में असंतुष्ट

अब लगभग यह तय होता जा रहा है की बीजेपी का असंतुष्ट खेमा चुप नही बैठनेवाला और वह आरपार की लड़ाई का मूड बना रहा है आखिर क्या कारण है की जो पार्टी कभी बाजपेय और आडवाणी जी के जमाने में अपनी अनुशासनप्रियता के चलते ‘ पार्टी विथ ए डिफरेंस ‘ कहलाती थी आज वही पार्टी ‘ पार्टी ऑफ़ डिफरेंसेस ‘ में तब्दील हो गयी है । इसका सीधा कारण है –सामूहिकता के भाव में कमी और पार्टी को लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने के चलते उत्पन्न संवादहीनता की स्थिति ।

 

पहले जहाँ आडवाणी और बाजपेय की जोड़ी नेताओं से उनकी परेशानियों से सीधे रूबरू होती थी , उनकी समस्याएं सुनती थी वही मोदी और अमित शाह की शैली ही बिलकुल अलग है जिसका सीधा सिद्धांत है –”either surrender or quit ” । आँखों पर काली पट्टी बाँध कर या तो हमारी वंदना करो या पार्टी से बाहर जाओ ।

 

पार्टी को पूरी तरह कॉर्पोरेट तानाशाही स्टाइल में चलाने की मंशा के चलते ही आडवाणी, जोशी और यशवंत सरीखे लोगों को ‘मार्गदर्शक मण्डल ‘ के पिंजरे में डाला गया । ये ऐसे लोग थे जिन्होंने बीजेपी को अनुशासन और सामूहिकता जैसे संस्कारों से सींच कर पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया था ।

जुमलेबाजियों में फंसी पार्टी

पार्टी का यह बुजुर्ग धड़ा नए दौर में पार्टी की संस्कारहीनता से उत्पन्न वैचारिक पतन को अपनी बूढी आँखों से देखने के लिए अभिशप्त हो गया है । यह देख रहा है की भ्रष्टाचार और राष्ट्ररक्षा समेत तमाम मसलों पर वर्तमान नेतृत्व कुछ करने के बजाय आज भी नयी नयी जुमलेबाजियों के जरिये जनता को भरमाने से बाज नही आ रहा। यही कारण है की बीजेपी में शत्रुघ्न सिन्हा जैसों की कतार दिनोदिन लंबी होती जा रही ,चाहे वह आर के सिंह हों या भोला सिंह या कीर्ति आज़ाद । भ्रष्टाचार से लड़नेवाले कीर्ति जैसे  व्हिसिल ब्लोअर’ की जबान काटी जा रही ।

खैर बातें हो रही थी शत्रुघ्न सिन्हा की । आजकल बीजेपी के छुटभैये नेता प्रायः बोलते मिल जाएंगे की शत्रु को बीजेपी ने बनाया , जिताया और पहचान दिया । पर जहाँ तक मुझे याद है कालीचरण 1976 और विश्वनाथ 1978 में रिलीज़ हुई थी और बीजेपी की स्थापना 1980 में हुई। यानि बीजेपी की स्थापना के पहले ही भारत के इस विश्वनाथ की की लोकप्रियता विदेशों तक में छा गयी थी । अब दो सांसदों वाली तब की भाजपा को शत्रु की लोकप्रियता से क्या फायदा हुआ और शत्रु को बीजेपी से क्या फायदा हुआ इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नही है ।और आज इसी कालीचरण को कैलाश विजयवर्गीय जैसे रीढ़विहीन नेता कुत्ते की उपमा दे रहे , तो क्यों न ख़ामोशी टूटे ? बिहार विधानसभा में पार्टी ने उनसे प्रचार तक नही करवाया , मुजफ्फरपुर में मोदी की परिवर्तन रैली से दूर रखा गया , पटना गांधी मैदान में आयोजित अमित शाह के कार्यक्रम तक में नही बुलाया गया ; तो फिर ये ख़ामोशी क्यों न टूटे ? और कहीं ख़ामोशी 2019 में भारी न पड़ जाए !

bharti.kumari-241x300लेखिका सामाजिक -राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. वह सम-सामियक विषयों पर लिखती हैं. उनसे bhartikumari 743@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

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