ये हैं वे तीन मुद्दे जिन पर लालू-नीतीश के बीच बढ़ रही है तनातनी

चुनाव आयोग द्वारा बिहार में सितम्बर- अकटूबर में चुनाव कराये जाने के इशारे के बीच राजद-जद यू के बीच सीट बंटवारा और नेतृत्व के लिए रस्साकशी शुरू हो गयी है. कहां है क्या पेंच?nitish_lalu_29092013

 इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

समचारों में बताया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी चाहते हैं कि सितम्बर- अक्टूबर में चुनाव कराये जायें. मौजूदा असेम्बली का कार्याल नवम्बर के अंतिम सप्ताह में समाप्त हो रहा है.

दूसरी तरफ राजद- जद यू और सपा के विलय का मामला लटकने के बाद अब राजद और जद यू के बीच कम से कम तीन मामलों पर तना-तनी शुरू हो गयी है. ये तीन मामले हैं सीटों का बंटवारा, चुनाव में नेतृत्व किसका और वोट बैंक की राजनीति.

पहला 

पिछले दिनों लालू प्रसाद के सहयोगी रघुवंश प्रसाद सिंह ने 143 सीटों पर दावेदारी, इशारों इशारों में क्या कर दी कि इसके जवाब में नीतीश ने कह डाला कि दावेदार तो कुल 243 सीटों पर भी कर लें. दर असल जद यू की सोच है कि उसने 2010 में 115 सीटें जीतीं, इसलिए उसे 115-20 सीटें मिलनी चाहिए जबकि राजद का तर्क है कि सीट बंटवारे का फार्मुला पार्टियों के वोट प्रतिशत से होना चाहिए. उसका कहना है कि 2014 चुनाव में उसके प्रत्याशी 33 असेम्बली सीटों पर आगे रहे, जबकि जद यू के मात्र 19.

दूसरा

दूसरी तरफ जद यू नेतृत्व को लेकर दबाव बनाने पर लगा है. जद यू का कहना है कि नीतीश कुमार को नेता घोषित कर चुनाव लड़ा जाये. इस पर राजद काफी सतर्क है और इस मुद्दे पर  अपने पत्ते खोलने से पहले कई नफा नुकसान की भरपाई करना चाहता है.

तीसरा

नीतीश और लालू के दरम्यान आपसी रस्साकशी की पहली बानगी तब देखने को मिली जब लालू ने सोशल मीडिया के जरिये यह बात रखी कि दलितों को प्रमोशन में आरक्षण पर राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए. जबकि दूसरे ही दिन नीतीश कुमार ने इस मामले पर जवाब देते हुए कहा कि लालू प्रसाद को लगता है कि सही जानकारी नहीं दी गयी. राज्य सरकार तो कोर्ट जाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी है.

राजग से अलग होने के बाद लालू प्रसाद ने नीतीश सरकार को बचाया. तब से अब तक लगभग एक साल का समय बीत गया. इस एक साल में यह पहला मौका है जब लालू नतीश ने नीतिगत बातों पर आमने सामने बात करने के बजाये मीडिया को चुना. दोनों परिपक्व नेताओं द्वार मीडिया द्वारा बात रखने को अगंभीरता नहीं मानी जा सकती. क्योंकि उन दोनों नेताओं को बखूबी पता है कि वे क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं.

लालू और नीतीश के इन बयानों की संजीदगी को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. ये बयान बताने के लिए काफी हैं कि अब शह-मात की राजनीति और तेज होगी.

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