सर्वे:बिहार के 40 प्रतिशत ग्रामीणों के घर में LPG गैस व 76 प्रतिशत घरों में जगम करती है बिजली

एक ताजातरीन सर्वे से पता चला है कि बिहार ग्रामीण क्षेत्रों के 40 प्रतिशत घरों में LPG और 76 प्रतिशत परिवार बिजली की रौशनी से अपने घरों को जगमग कर रहे हैं. जबकि 2015 में 20 प्रतिशत परिवारों के पास ही बिजली उपलब्ध थी.

ये नतीजे कॉउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट और वाटर (सीईईडब्ल्यू-CEEW) द्वारा हाल में किए गए भारत के सबसे बड़े बहुआयामीय ‘एनर्जी एक्सेस सर्वे’ (ऊर्जा पहुंच संबंधी सर्वेक्षण) के दूसरे दौर के नतीजों से सामने आये हैं.
सीईईडब्ल्यू-CEEW अनुसार वर्ष 2018 में बिहार के 76 प्रतिशत ग्रामीण परिवार प्राथमिक प्रकाश (प्राइमरी लाइटिंग) के स्रोत के रूप में ग्रिड से प्राप्त बिजली पर निर्भर थे, जो वर्ष 2015 के 20 प्रतिशत के आंकड़े से बढ़ोतरी का स्पष्ट संकेत देता है।
ग्रिड से प्राप्त बिजली के इस्तेमाल में हुई इस बढ़ोतरी से प्राथमिक प्रकाश के स्रोत में उपयोग होने वाले केरोसिन तेल (मिट्टी का तेल) के अनुपात में चार गुना से अधिक की कमी आई है।
यानी दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वर्ष 2015 में केरोसिन का इस्तेमाल करने वाले परिवार 68 प्रतिशत थे, जबकि वर्ष 2018 में ऐसे परिवार घट कर 16 प्रतिशत रह गए।
इसके अलावा राज्य के 40 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने प्राथमिक रसोई ईंधन के रूप में एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) का इस्तेमाल किया, परंतु वर्ष 2015 में केवल 14 प्रतिशत परिवार ही एलपीजी का उपयोग खाना पकाने के लिए कर रहे थे।
रसोई में एलपीजी के प्रयोग से घर में आंतरिक वायु प्रदूषण के कारण होने वाली स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों व खतरों में कमी आती है। आम तौर पर घरेलू आंतरिक वायु प्रदूषण पैदा करने में पारंपरिक ईंधन जैसे जैवईंधन (बायोमास), उपले व गोइठा और कृषि संबंधी अवशेष की बड़ी भूमिका होती है।
सरकार की योजनाओं जैसे ‘सौभाग्य’ और ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (पीएमयूवाई) ने बिहार में ऊर्जा की उपलब्धता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परंतु इनकी विश्वसनीयता और वहनयोग्य संबंधी चिंताएं अब भी बरकरार हैं।
 
ये आंकड़े सीईईडब्ल्यू द्वारा किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन ‘एक्सेस टु क्लीन कुकिंग एनर्जी एंड इलेक्ट्रिसिटी-सर्वे ऑफ स्टेट्स एक्सेस’ (ACCESS) के निष्कर्ष हैं, जिसे ‘शक्ति सस्टेनेबल एनर्जी फाउंडेशन’ और ‘नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर’ के सहयोग से तैयार किया गया। ‘सीईईडब्ल्यू-आईएसईपी-एनयूएस सर्वे’ पर आधारित इस अध्ययन के दौरान भारत में ऊर्जा की कमी से जूझ रहे छह प्रमुख राज्यों के 54 जिलों के 756 गांवों के 9000 से अधिक परिवारों का सर्वेक्षण किया गया।
वर्ष 2015 में ‘एक्सेस सर्वे’ के पहले दौर को पूरा करने के बाद आगे की कड़ी में सीईईडब्ल्यू के अध्ययन दल ने वर्ष 2018 के मध्य में फिर इन छह राज्यों के उन्हीं परिवारों का दूसरी बार सर्वेक्षण किया, ताकि पिछले तीन सालों में ऊर्जा तक उनकी पहुंच की स्थिति में आए बदलावों का मूल्यांकन किया जा सके। इस दौरान बिहार में 9 जिलों के 125 गांवों के 1500 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया।

कितने घंटे बिजली

वर्ष 2015 से 2018 के बीच बिहार के 86 लाख ग्रामीण परिवार बिजली-पहुंच की सीढ़ी में निचले पायदान से ऊपर की ओर पहुंच गए हैं। लेकिन बिहार के 37 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास अभी भी या तो बिजली नहीं पहुंची थी या उन तक बिजली की उपलब्धता बेहद खराब थी।

 

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन ने पाया कि बिजली की अधिक पहुंच कई ग्रामीण परिवारों में विश्वसनीय और गुणवत्तापरक बिजली के रूप में पूरी तरह से परिवर्तित नहीं हो पाई है।

 

खराब स्तर की बिजली उपलब्धता वाले अधिकतर ग्रामीण परिवारों ने एक महीने में पांच दिन या इससे अधिक दिन ‘ब्लैकआउट’ की स्थिति का अनुभव किया है, इसके अलावा महीने में कम से कम चार दिनों तक वोल्टेज में उतार-चढ़ाव (वोल्टेज फलक्च्युएशन) से घरेलू बिजली उपकरणों को नुकसान हुआ या एक महीने में कम से कम सात दिनों तक कम वोल्टेज की स्थिति से घरेलू उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक जैसी दिक्कतें पैदा हुई हैं।

 

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