हिन्दी कविता-सुंदरी के अनमोल गहना थे महाकवि प्रभात

पटना,  स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय क्रांतिकारी कवि और छायावाद काल के विलक्षण प्रतिभा के रहस्यवादी कवि महाकवि केदारनाथ मिश्र प्रभात हिन्दी कविता-सुंदरी के अनमोल गहना थे। ‘कर्ण’ और ‘कैकेयी’ को अपनी कवित्त-शक्ति से एक विराट व्यक्तित्व प्रदान करने वाला यह कवि हिन्दी साहित्य का वह वेशकीमती हीरा है, जिस पर बिहार को हीं नहीं, अपितु संपूर्ण साहित्य-संसार को गर्व होना चाहिए। अत्यंत मूल्यवान 27 काव्य पुस्तकों, सात गद्य-पुस्तकों तथा 2 अँग्रेजी निबंध संकलनों के द्वारा उन्होंने साहित्य-सागर को जो समृद्धि प्रदान की उस अवदान का कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता है।IMG_20160911_162020

यह विचार आज यहाँ साहित्य सम्मेलन द्वारा आयोजित हिन्दी पखवारा के 11वें दिन महाकवि प्रभात की 110वीं जयंती पर आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने व्यक्त किए। डा सुलभ ने कहा कि, प्रभात जी राज्य सरकार में पुलिस सेवा में थे। आरक्षी उपाधिक्षक के पद से उन्होंने अवकाश लिया था। जिनके हाथों में सरकार ने तमंचे पकड़ाए थे, उन हाथों में लेखनी कितनी प्रवल शक्ति के साथ मुखर हुई, वह चकित करती है। उनकी रचनाओं में इंद्रधनुषी सप्त-रंगी छटाएँ दिखाई देती हैं। वे ‘जिगर के टुकड़े’ और ‘ज्वाला’ जैसी शौर्य का प्राण फ़ूंकनेवाली क्रांतिधर्मी रचनाएं करते हैं, जिन्हें अँग्रेजी शासन से भयभीत होकर, प्रकाशक अपने कार्यालय में हीं जलाकर नष्ट कर देता है, तो वहीं ‘बैठो मेरे पास’ जैसी प्रेम और मनुहार की कविताएँ भी गढते हैं। ‘कर्ण’ नाम से हीं महाभारत के उस महान योद्धा महादानी और पराक्रमी कर्ण पर जैसा उन्होंने लिखा, वैसा फ़िर कभी लिखा नहीं जा सका। ‘मुक्ति-संग्राम’, ‘ॠतंभरा’, ‘श्वेत नील’, ‘सेतुबंध’ जैसे महाकाव्य और काव्य-संग्रह अभिभूत करनेवाले उच्च श्रेणी के साहित्य का दर्शन कराते हैं तो ‘चिर-स्पर्श’ और ‘प्रभास-कृष्ण’ में उनकी दार्शनिक और आध्यात्मिक ऊँचाई का अनुभव किया जा सकता है। वह जिस प्रतिभा के आलोक पुरुष थे, देश ने वह मान उन्हें नहीं दिया, किंतु वे अपने साहित्य से सदैव स्तुत्य बने रहेंगे।

महाकवि पर अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए कवि ओम प्रकाश पाण्डेय ने कहा कि बिहार के काव्य-गगन में पूर्णिमा के चाँद थे महाकवि प्रभात। प्रभात जी ने बिहार में साहित्य का अलख जगाया था। उनकी कविताएँ हिन्दी साहित्य की धरोहर हैं।

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के साहित्य मंत्री डा शिववंश पाण्डेय ने कहा कि, पुलिस सेवा में रहते हुए भी प्रभात जी ने जीवन-पर्यन्त साहित्य सृजन में लगे रहे। अपने पाँच दशकों की साहित्यिक यात्रा में प्रसाद जी ने कैकेयी, कर्ण, तप्तगृह जैसे प्रबन्ध काव्यों के अतिरिक्त काल दहन, स्वर्णोदय जैसी नृत्य-नाटिका, कलापिनी, श्वेत-नील जैसे गीति-काव्यों का सृजन किया। वे मानवीय संवेदनाओं से युक्त एक अत्यंत मृदुल व्यक्ति थे।

सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेन्द्र नाथ गुप्त, पं शिवदत्त मिश्र, बच्चा ठाकुर, प्रो वासुकी नाथ झा, प्रभात जी की पुत्रवधु निर्मला मिश्र, पुत्र मोहन मृगेन्द्र, पुत्री कुमारी नम्रता, शंकर शरण मधुकर, बिंदेश्वर प्रसाद गुप्ता तथा राज कुमार प्रेमी ने भी अपने उद्गार व्यक्त किये। मंच का संचालन किया योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन सम्मेलन के प्रचार मंत्री राज कुमार प्रेमी ने किया।

हिन्दी पखवारा के अंतर्गत आज पूर्वार्द्ध में विद्यार्थियों के बीच ‘स्वरचित काव्य-पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें पटना विमेन्स कौलेज, बी एन कौलेज, पटना कौलेज, कौलेज औफ़ कौमर्स तथा पटना सेंट्रल स्कूल समेत दर्जन भर महाविद्यालयों के 53 छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। डा विनोद कुमार मंगलम, आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, प्रो सुशील झा, कवयित्री सरोज तिवारी और डा कुमारी मनीषा ने सामूहिक रूप से इस प्रतियोगिता का संचालन किया।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*