Aung San SuuKyi;हिरासत में रोहिंग्यों पर जुल्म ढ़ाने वाली हत्यारिन

Aung San SuuKyi;हिरासत में रोहिंग्यों पर जुल्म ढ़ाने वाली हत्यारिन

मानवाधिकार के लिए कभी लड़ने वाली Aung San Suukyi लोकतंत्र के लबादे में लिपट कर 18 हजार महिलाओं का रेप, 24 हजार लोगों की हत्यारन बनी. आज वह सलाखों में पहुंच चुकी है.

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Irshadul Haque, Editor naukarshahi.com

जेल की सलाखों में रहते हुए 1991 में जब आंग सान सू ची Aung San Suukyi को शांति का नोबल पुरस्कार मिला तो रातों रात वह दुनिया पर छा गयीं. म्यांमार में तानाशाही शासन के खिलाफ लम्बे संघर्ष में करीब डेढ़ दशक जेल में बिता चुकी थीं. मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली आंग सान सूची तब जन अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों के लिए एक प्रतीक बन कर उभरी थीं. 1948 में अंग्रेजों से आजादी के संघर्ष में उनके पिता जनरल आंग सान की हत्या हो चुकी थी. तब वह महज दो साल की थीं. उन्होंने 1989 से 2010 तक अपनी जवानी के सुनहरे दिनों के 15 वर्ष जेल में बिताये और जब वह जेल से बाहर आयीं तो 2015 के चुनाव में भारी विजय के साथ सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने सरकार बना ली.

यह आंग सान सूची के संघर्षपूर्ण जीवन का एक पक्ष था. तब तक वह दुनिया मेे एक हिरोइक इमेज प्राप्त कर चुकी थीं. लोकतंत्र और मानवाधिकार का प्रतीक बन चुकी थीं.

लेकिन 2016-17 आते आते आंग सान सूची का एक कुरूप चेहरा सामने आता है. वहां के अल्पसंख्यक समुदाय रोहिंग्या के खिलाफ वहां की फौज को उतार दिया जाता है. 2016-17 से 2018 तक वहां हजारों रोहिंग्या मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. युएन के आंकड़ों के अनुसार आन सांग सूची की सहमति से सात लाख से ज्यादा रोहिंग्या को देश छोड़ कर बांग्लादेश, इंडोनेशिया और भारत जैसे देशों में पनाह लेने को मजबूर होना पड़ा. इसी रिपोर्ट के अनुसार 18 हजार से ज्यादा महिलायें, बच्चियां बलात्कार, यौन शोषण और अन्य क्रूरता की शिकार बनायी गयीं. जबकि 36 हजार लोगों को आग के हवाले कर दिया गया.

म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के कत्ल ए आम के खिलाफ पटना में हुआ जोरदार प्रदर्शन

आधुनिक युग की मानवता की बड़ी त्रासदियों में से एक थी. इतने बड़े पैमाने पर रोहिंग्या के साथ होने वाले जुल्म व सितम पर आंग सान सूची का का पूरा समर्थन तो था ही, साथ ही वह इसे जायज भी करार दे रही थीं. तब बड़े पैमाने पर शांति के इस कथित दूत से शांति का नोबल पुरस्कार वापस लेने की मांग होने लगी. लेकिन नोबल पुरस्कारों की वापसी का कोई नियम न होने के कारण यह मांग ठंडी पड़ गयी.

रोहिंग्या के कत्लेआम का मामला इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस में गया. पर शर्मशार करने वाली बात यह थी कि खुद वहां आंग सान सूची अपनी करतूतों के बचाव में दलील देने पहुंची थीं.

लोकतंत्र के लबादे में हत्यारिन

जब तक आंग सान सूची के ऊपर सत्ता का नशा ना छाया था तब तक दुनिया ने उनके असली चेहरे को नहीं देखा था. लेकिन सत्ता में रह कर उनकी सरकार ने जो जुल्म किया उससे यह साफ हो चुका था कि वह लोकतंत्र के लबादे में लिपटी हुई एक ऐसी हत्यारिन हैं जो लोकतंत्र के नाम पर दुनिया का समर्थन तो हासिल कर ली, लेकिन लोकतंत्र को शर्मशार कर दिया. हम जैसा एक अदना इंसान जो जर्रा बराबर भी लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकार में विश्वास रखता है वह हर लोकतांत्रिक सोच वाले के समर्थन में आ जाता है. लेकिन लोकतंत्र के लबादे में लोकतंत्र की हत्या करने, मानवधिकार का खुल्लम उल्लघंन करने वाले का हम कभी समर्थन नहीं कर सकते.

ऐसे में आज म्यांमार की सेना ने आंग सान सूची को सत्ता से बेदखल कर के उन्हें अरेस्ट कर लिया है. पिछले साल नवम्बर में हुए चुनाव में जीत के बावजूद वहां की फौज ने लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्थ कर दिया. और एक साल के लिए सरकार के तमाम अधिकार सेना प्रमुख मिन आंग लाई ने अपने हाथों में ले लिया.

मिन आंग लाई की इस तानाशाही के भी हम घोर आलोचक हैं. क्योंकि सेना प्रमुख ने लोकतंत्र को ध्वस्त कर दिया. मिन आंग लाइ के आ जाने से म्यांमार में मानवाधिकार सुरक्षित होने की कोई संभावना नहीं है. रोहिंग्या पर जुल्म घटने की आस लगाना भी बेमानी है. लेकिन तानाशाह सेना अपनी पहचान से तानाशाह है और मानवाधिकार विरोधी है. ऐसे में हम ना सेना की सत्ता का समर्थन कर सकते हैं ना लोकतंत्र के लबादे में लिपटे आंग सान सूची के दमन व अत्याचार को.

ऐसे में आंग सान सूची की सत्ता से बेदखली पर हम जरा भी उनके प्रति सहानुभूति नहीं रखते. उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां की जनता एक नए नेतृत्व में लोकतंत्र के लिए फिर उठ खड़ी होगी।

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