एडिटोरियल कमेंट: 370 खत्म कर, कश्मीर को दो टुकरे करना नोटबंदी जैसा आत्मघाती तो नहीं?

एडिटोरियल कमेंट: 370 खत्म कर कश्मीर को दो टुकरे करना नोटबंदी जैसा आत्मघाती तो नहीं?

अनुच्छेद (Article) 370 समाप्त हो गया. जम्मु कश्मीर दो टुकड़ों में बांट दिया गया. मोदी सरकार का यह विशुद्ध राजनीतिक फैसला कहीं नोटबंदी की तरह आत्मघाती तो नहीं?

Irshadul Haque, Editor naukarshahi.com

 

नोटबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को झंकझोर कर रख दिया था. हजारों छोटे कारोबार को तहस-नहस और लाखों लोगों को बेरोजगार बना दिया था. नोटबंदी के इस भयावह दंश को देश तीन साल से झेल रहा है और अर्थव्यवस्था पर काले बादलों का मजमा और ही गहरा होता जा रहा है.

दिल्ली के हाथ में बेलगाम सत्ता

तो अब सवाल यह है कि जम्मु कश्मीर से अनुच्छेद 370( Article 370) को समाप्त कर देना और तुरत जम्मु कश्मीर पुनर्गठन के फैसले को 5 अगस्त से व्यावहारिक बना देने के परिणाम पर चर्चा से पहले हमें यह जानना चाहिए कि मोदी सरकार ने किस राजनीतिक उद्देश्य के तहत यह फैसला लिया है. आगे बढ़ने से पहले यह भी जानना जरूरी है कि जम्मु कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370 समाप्त करने के बाद अब इसके विशेष राज्य का स्टेटस समाप्त हो गया है. अब कश्मीरियों के अधिकार सीमित हो चुके हैं. जम्मु कश्मीर को दो टुकड़ों में बांट दिया गया है. जम्मु कश्मीर और लद्दाख अब अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिये गये हैं. लद्दाख की स्थिति चंडीगढ़ जैसी होगी जहां कोई राज्य सरकार नहीं होगी. जबकि जम्मु कश्मीर दिल्ली की तरह का राज्य होगा जिसके पास कानून व्यवस्था के लिए पुलिस बल तक अपना नहीं होगा. मतलब साफ है वहां मुख्यमंत्री तो होगा पर उसके हाथ में वहां की कानून व्यवस्था नहीं होगी. यह सत्ता के केंद्रीयकरण की दिशा में मोदी सरकार का अब तक का सबसे महत्वकांक्षी फैसला है. यानी दिल्ली के हाथ में सत्ता को नियंत्रित होगा.

कश्मीरियों की नुमाइंदगी पर संकट

जहां तक अनुच्छेद 370 खत्म करने और कश्मीर को दो टुकड़े करने के राजनीतिक मायने हैं वह काफी व्यापक होंगे. सबसे पहले तो लोकसभा का नया सीमांकन होगा. इस सीमांकन में कश्मीरियों के प्रतिनिधित्व को छिन्न-भिन्न करने का पूरा इंताजम किया जायेगा. मतलब साफ है कि लोकसभा में कश्मीरियों की नुमाइंदगी कमजोर और संख्याबल में कमी आयेगी. कश्मीर से जो आवाजें उभर रही हैं उससे भी ऐसा लगता है. कश्मीरियों को भी संदेह है कि उन्हें अब अल्पसंख्यक बना दिया जायेगा.

क्षेत्रीय दलों का भविष्य अंधकारमय

अब यह भी माना जा रहा है कि मेनस्ट्रीम की रानीतिक पार्टियों जैसे नेशनल कॉंफ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियों का राजनीतिक रसूख कमजोर पड़ेगा और स्वाभाविक तौर पर वहां ऐसा सियासी इंतजाम किया जायेगा जिससे भाजपा की जड़ें वहां मजबूत हो सके.

 

जहां तक कश्मीर में शांति की उम्मीद पालने की बात है तो इसके बारे में काफी संदेह है, नाउम्मीदी है. पहले से ही खून खराबे, हिंसा और अतिवाद झेल रहे कश्मीर में शांति के बजाये संघर्ष के हालत बढ़ सकते हैं.

नोटबंदी की तरह आत्मघाती फैसला

जिस राजनीतिक मकसद के लिए मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर को दो टुकड़ों में बांटने का फैसला लिया है, वह मकसद भले ऊपरी तौर पर पूरा होता दिखे लेकिन जहां तक कश्मीर में अमन की उम्मीद का मामला है तो यह कहा जा सकता है कि कश्मीर को दो टुकड़ों में बांटने का फैसला नोटबंदी की तरह अदूरदर्शी फैसला होगा. नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के फैसले को लेते हुए दावा किया था कि देश से काला दन समाप्त हो जायेगा, भ्ष्टाचार समाप्त हो जायेगा और नकली नोट भारतीय अर्थव्यवस्था से खत्म हो जायेंगे. जबकि नोटबंदी ने उलटा असर दिखाया. ना काला धन खत्म हुआ, ना नकली नोट बरामद हुए और ना ही भ्रष्टाचार में रत्ती भर ही कमी आयी.

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