विश्व शांति की स्थापना में सूफीवाद की जरुरत

               विश्व शांति की स्थापना में सूफीवाद की जरुरत

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मौजूदा दौर इंसानी तरक्की के ऊंचाई और इल्म व हुनर के सब्र अजमा चरण से गुजर रहा है

मौजूदा दौर इंसानी तरक्की के ऊंचाई और इल्म व हुनर के सब्र अजमा चरण से गुजर रहा है. दुनियावी तरक्की के बावजूद इंसानी रूह अपने आमाल-ए-जश्त की कशाफत से बुरी तरह मजरुह हो चुकी है. मानवता हर समय खौफ और दहशत की ज़िन्दगी गुजारने पर मजबूर है.

कहीं दिन-व-मजहब के नाम पर आतंकवाद तो कहीं कुरआन व सुन्नत की गलत तशरीहात पेश करके उम्मते-ए-मुस्लिमा को उसके विश्वासों और विचारों से मुनहरिफ करने के प्रयास को बढ़ावा दे रहें हैं. ऐसे फिटने भरे माहौल में तसव्वुफ़ की शिक्षा ही दुखयारी इंसानियत के सरों पर अमन व अमान शामियाने नसब करने का काम कर सकती है.

तसव्वुफ़ असल में कुरआन व सुब्बत की सही इतेब्बा का नाम है. तसव्वुफ़ की सबसे बुनियादी शिक्षा है कि इंसान अपने खालिक व मालिक से कल्बी व रूहानी रिश्ता बनाए और फिर उसकी रौशनी में वह दुनिया को अमन व शान्ति, मुहब्बत व भाईचारगी का दरस दे. अल्लामा इब्रे खलदून तसव्वुफ़ कि तारीफ करते हुए लिखते हैं ‘तसव्वुफ़ का अर्थ इबादत में हमेशा पाबंदी करना, अल्लाह पाक की पूरी तरह मुतव्वाजा रहना, दुनिया की सुन्दरता की तरफ से रुगदार्नी करना, माल व जाह की लज्जत जिसकी तरफ आम लोग आकर्षित होते हैं इससे किनारा कश होना. यह तरीका सहाबा और सल्फ़ सालेहीन में सामान रूप से प्रचलित था’. ( कश्फुल महजूब, शेख सैय्यद अली हजवेरी, उर्दू अनुवाद अज फज्ज्लुदीन गौहर पृष्ठ 11)

इस्लाम ने हमेशा भाईचारा, सहनशीलता और अमन का पैगाम दिया

तसव्वुफ़ हरगिज इस बात की शिक्षा नहीं देता कि रहबानियत इख़्तियार करके जंगल या बयाबान की तरफ कुछ कर लिया जाए बल्कि दुनिया में रहते हुए अल्लाह से संबंध कायम रखने के साथ खुदा के मखलूक के साथ सिलह रहमी और भलाई का मामला उस्तवार किया जाए.

मौलाना रुम फरमाते हैं.

चीस्त दुनिया अज खुदा गाफिल बदन … ने कुमाश व नकरा व फरजन्दोंजन

( अथार्त दुनिया अल्लाह पाक से गाफिल होने का नाम है ना कि दुनियावी असबाब, माल व जर और अहलो अयाल को इख्तियार करने का )

कमाल बात तो फरागत-ए-कल्बी और ताल्लुक बिल्लाह है: बगीर रश्म ऐ ताल्लुक दिला अज मुर्गाबी…कि औज आब चु बर्खास्त खुश्क पर बर्खास्त

अथार्त ऐ दिल तुझे संबंध की रश्म व रीत अगर सीखना है तो मुर्गाबी से सिख कि वह पानी में रहने के बावजूद जब उससे बहार आती है तो उससके पुरों पर पानी का मुतलक असर नहीं होता.

इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने की प्रवृत्ति

मौलाना जामी फरमाते हैं.

अपनी ज़िन्दगी से मेरी आरजू बस तेरी बंदगी है. जिंदादिल लोगों पर तेरे बिना साँस लेना भी हराम है. ख्वाजा तुझसे केवल हर व्यक्ति अपना उद्देश्य चाहता है, मगर जामी तुझसे केवल तुझ ही को चाहता है और बस.

तसव्वुफ़ असल में शरीयत के बताए हुए सिधान्तों पर अल्लाह पाक से संबंध करने का नाम है. तसव्वुफ़ दिल कि निगहबानी का दूसरा नाम है क्यूंकि इन्सान बझिर जिस्म और नफ्स का नाम है मगर असल में, दिल का नाम है और अगर दिल मुशलमान ना हो सका तो रुकुअ व सुजूद या जुबान से खुदा का इकरार दोनों निरर्थ है. समाया है जब से नजरों में मेरी जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है और फिर उसी खुदा के जलवे कि बरकत से वह अमन व अमान की वास्तविक मंजिल को प् लेता है, जहाँ केवल मुहब्बत होती है और फिर इसका सन्देश, पैगाम मोहब्बत बन जाता है और इसका काम उसी मुहब्बत की तार से लोगों के दिलों को जोड़ने का होता हा जिससे की दुनिया का कोई शख्स इससे जुदा ना रहे.

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