PK को राजनीति की जमीन से आसमान पर बिठाने के पीछे क्या है नीतीश का तेजस्वी फैक्टर?

PK को राजनीति की जमीन से आसमान पर बिठाने के पीछ क्या है नीतीश का तेजस्वी फैक्टर?

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इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जदयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना डाला है। प्रशांत किशोर यानी PK, एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास सक्रिय राजनीति का कोई अनुभव नहीं। न ही, संगठन क्षमता का कोई अनुभव। बस एक पहचान जो PK ने बनाई है, वह है चुनावी रणनीतिकार की। वह भी एक प्रोफेशनल चुनाव रणनीतिकार। जिसने अब तक अपनी तमाम सर्विसेज का दाम नकद में वसूला है।

PK का तेजस्वी फैक्टर

नीतीश 68 के हो गये हैं। यह तन और मन से थक जाने की उम्र है। पिछले दो तीन वर्षों से नीतीश खुद भी इस बात को अपने निकटतम लोगों से कहते भी रहे हैं। नीतीश राजनीति के चाणक्य हैं। किसी दौर में उनके सबसे भरोसेमंद समकालीन नेता रहे लालू प्रसाद ने ही यह बात कही थी। लिहाजा नीतीश जानते हैं कि ऐसे दौर में जब बिहार की सियासत में युथ को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता की तरफ बढ़ता हुआ नौजवान- तेजस्वी अपना स्पेस बना रहा है. ऐसे दौर में किसी घिसे-पिटे पुराने मुहरे को उसके मद्देमुकाबिल खड़ा करना  मौजू नहीं है। ऐसे में एक ऐसे युवा की तलाश स्वाभाविक तौर पर नीतीश को थी।PK उस लिहाज से भले ही, तेजस्वी की तरह पॉलिटकल लिगेसी के वारिस ना हों, पर रणनीतिक क्षमता के लिहाज से मजबूत व्यक्ति हैं। PK का सेलेक्शन एक युथ के मद्देमुकाबिल दूसरे युथ को खड़ा करने की कोशिश है। हालांकि तेजस्वी और PK का जो दूसरा सबसे बड़ा अंतर है, वह है PK का ब्रह्मण होना। मौजूदा बिहारी सियासत में अपर कास्ट का युथ तेज तर्रार होने के कारण राजनीति की ऊबड़खाबड़ जमीन पर समस्याओं के निदान का रास्ता तो निकाल सकता है सामाजिक दृष्टि से बंटे बिहार जैसे राज्य में मास लीडर की तरह उभर पाने की जोखिम को असानी से पार नहीं कर सकता।

आखिर PK की राजनीतिक प्रतिबद्धता है क्या?

इस मामले में एक बात यह भी याद रखने की है कि प्रशांत किशोर यानी PK की राजनीतिक धारे की प्रतिबद्धता अस्पष्ट है. उनकी सोच समाजवादी है, दक्षिणपंथी है या वामपंथी. यह कोई नहीं जानता. खुद नीतीश कुमार भी नहीं। क्योंकि प्रशांत ने अपने सात आठ साल के प्रोफेशनल करियर में भाजपा का झंडा भी थामा है, तो कांग्रेस और जदयू का भी ढोल बजाया है। लिहाजा कालांतर में प्रशांत राजनीति के किन अवसरों पर कौन सा रंग अपनायेंगे यह फिलवक्त कह पाना संभव नहीं है.

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वैसे नीतीश कुमार ने, भले ही अपने स्वजातीय नौकरशाह आरसीपी सिंह को उत्तरप्रदेश के प्रशासनिक गलियारे से उठा लाये थे पर उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह भी 60 की उम्र को पहुंच चुके थे। दूसरा- आरसीपी ने पिछले चार सालों में कोई करिश्माई पहचान नहीं प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। उधर नीतीश के सामने नयी पीढ़ी का एक युवक खुद उनके बेटे थे- निशांत कुमार। पर निशांत की समस्या यह थी कि उनकी दक्षता ने नीतीश को कभी प्रभावित नहीं किया। शायद नीतीश को पता हो कि भले ही निशांत को ठेल-ठाल कर सत्ता के गलियारे में पहुंचा दिया जाये, पर वह लम्बी रेस का घोड़ा शायद ही साबित हो पाते. कहा यह भी जाता है कि खुद निशांत की भी न तो राजनीतिक महत्वकांक्षा रही है और न ही दिलचस्पी।

बेटे निशांत के साथ नीतीश

हालांकि यह समझ लेना कि नीतीश कुमार ने PK को अपना राजनीतिक वारिस चुन लिया हो, यह भी सही नहीं होगा। पर यह भी तय है कि नीतीश अब उस मुकाम पर आ चुके हैं जहां से वह अपनी राजनीतिक धारा को आगे बढ़ाने के लिए नयी पीढ़ी को सामने लाने में लगे हैं. इसी नयी पीढ़़ी में दूसरा नाम है अशोक चौधरी का। अशोक बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और खुद नीतीश काबीना के मंत्री रह चुके हैं। माना जाता है कि अशोक को, नीतीश ने यही कहते हुए जदयू में लाया था कि अब वह बूढ़े हो रहे हैं। पार्टी को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अब जिनकी होगी उनमें अशोक चौधरी भी एक हो सकते हैं।

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नीतीश का यह कदम कितना कारगर हो सकेगा, फिलहाल कह पाना संभव नहीं। पर यह तय है कि सत्ता के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता पर कभी भी कायम नहीं रह पाने वाले नीतीश ने यह जरूर भांप लिया है कि भाजपा को झटका दे कर राजद के सहारे सत्ता के सिंहासन पर चढ़ना औ फिर झटके में राजद को गच्चा दे कर भाजपा के साथ चले जाने के बाद उनकी विश्वसनीयता पर जबर्दस्त बट्टा लग चुका है. ऐसे में उन्हें एक नये फेस की तलाश थी। उन्हें यह फेस PK में दिखा है।

 

 

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