Surgical Strike: अपने अंधकारमय भविष्य की इबारत लिख रहे हैं तेज प्रताप यादव

Surgical Strike: अपने अंधकारमय भविष्य की इबारत लिख रहे हैं तेज प्रताप यादव

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

तेज प्रताप यादव  महज तीन साल के अपने सार्वजनिक जीवन में अनेक उथल-पुथल के शिकार हैं. एक तो परिस्थितियों ने उनके निजी जीवन को तनावपूर्ण बना डाला है. दूसरी तरफ राजनीतिक जीवन में उनके कुछ कदम खुद उनके  भविष्य के लिए अच्छे इशारे नहीं हैं. उधर भाजपा जैसी वैचारिक विरोधी पार्टी के नेता इस उथल-पुथल को हवा देने में लगे हैं.

तेज प्रताप का राजनीतिक जीवन 2015 में शुरू हुआ. वह राघोपुर से पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े. जीते. मंत्री बने. सरकार बदली. मंत्रिपद गया. फिर शाादी हुई. कुछ ही महीनों में वैवाहिक जीवन घुटन का शिकार बना.तनाव के शिकार तेज ने आध्यात्मिक यात्रायें की.परिवार से नाराज रहे. वैवाहिक जीवन को खुद ही कानूनी पेचीदगियों में उलझाया. इस तरह तीन साल बीत गये.

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इन तीन सालों में तेज प्रताप ने, पहले मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए अपने आध्यात्मक जीवन को भुनाने की कोशिश की. संख बजा कर, कभी बांसुरी की तान सुना कर तो कभी चापा कल पर नहा कर विडियो अपलोड किया. इस दौरान वह जाने-अंजाने आम लोगों के कौतुहल का कारण बनते गये. कभी साइकल चलाते हुए गिरने की तस्वीरें वॉयरल हुई तो कभी नहाते हुए उनके पर्दे में छिपे अंगों का बेपरवाह दिख जाने वाला विडियो से उन्हें अफसोस का शिकार होना पड़ा.

अगंभीर छवि का विकास

इस तरह धीरे-धीरे मीडिया के लिए कौतुहल और अगंभीर छवि छोड़ते हुए तेज प्रताप आगे बढ़ते गये. लेकिन इस दौरान उनके सामने कई गंभीर मुद्दे भी आये जिसे वह चाहते तो इन मुद्दों को सार्वजनिक बहस से बचा सकते थे. इन में से सबसे प्रमुख मुद्दा था उनका वैवाहिक जीवन. अपने राजनेता स्वसुर चंद्रिका राय और अपनी पत्नी से छिड़ा विवाद अब उन्हें राजनीति के दोराहे पर ला खड़ा कर चुका  है.

 

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मौजूदा विवाद इस बात को ले कर उरूज पर है कि लोकसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण में उनकी नहीं चली. बकौल तेज प्रताप पार्टी अगर उनकी बातों को नहीं मानती तो वह ‘लालू-राबड़ी मोर्चा’ तले अपना राजनीतिक अभियान शुरू करेंगे. वह अपनी पंसद के उम्मीदवार खड़ा करेंगे. जरूरत पड़ी तो वह खुद भी चुना में कूद पड़ेंगे.

ऐसे में तेज प्रताप को अपनी पार्टी और परिवार से जुड़े मुद्दे को घर के अंदर सुलझा कर याथाशीघ्र सक्रिय रूप से राजद के चुनावी अभियान का हिस्सा बन जाना चाहिए. तेज प्रताप के सामने उत्तर प्रदेश का उदाहरण भी सामने है जब 2014 और 2017 के चुनाव में मुलायम परिवार की गलतियों के कारण आज वह पार्टी सब कुछ खो चुकी है.

लालूवाद और जेपी मूवमेंट के तौर पर एलपी ( लालू प्रसाद) मूवमेंट का बिगुल फूकने के हिमायती तेज प्रताप ने लोकतांत्रिक व समाजवादी राजनीति की दीक्षा अपने पिता से ली है. ये राजनीतिक संस्कार उनकी रगों में है. वह इससे डिगेंगे ऐसी संभावना ना के बराबर है. लेकिन फिलहाल वह अपनी ही पार्टी के खिलाफ जिस हद तक जा रहे हैं उससे किसी भी सूरत में लालू यादव और राजद को लाभ नहीं होने वाला. तेज प्रताप के इस कदम से सोशल जस्टिस और धर्मनिरपेक्षता को  कीमत चुकानी पड़ सकती है. इसका लाभ यकीनन भाजपा को होगा.

 

तेज प्रताप यादव को यह भी सोचना चाहिए कि अगर वह लगातार अपने स्टैंड पर कायम रहे तो उनकी सोशल जस्टिस और यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष वाली छवि को भी भारी नुकसान पहुंचेगा. सेक्युलर और सोशल जस्टिस का आधार वोट उनके लालू-राबड़ी मोर्चा की तरफ कत्तई शिफ्ट नहीं होने वाला

 सोशल जस्टिस की सियासत को खतरा

हालांकि तेज प्रताप यह कहते हुए देखे जा रहे हैं कि भाजपा को लाभ नहीं लेने देंगे. तेज प्रताप चाहे भी बयान दें, उससे उनकी पार्टी और खुद उनको नुकसान होगा. तेज प्रताप को इस पर गंभीरता से सोचना होगा. वह अपने निजी जीवन से जुड़े मुद्दे को राजनीति में क्यूं समेट रहे हैं. अपने स्वसुर चंद्रिका यादव पहले राजद के नेता हैं बाद में उनके स्वसुर हैं.

भाजपा के ट्रैप में आने से बचें

तेज प्रताप यादव को यह भी सोचना चाहिए कि अगर वह लगातार अपने स्टैंड पर कायम रहे तो उनकी सोशल जस्टिस और यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष वाली छवि को भी भारी नुकसान पहुंचेगा. सेक्युलर और सोशल जस्टिस का आधार वोट उनके लालू-राबड़ी मोर्चा की तरफ कत्तई शिफ्ट नहीं होने वाला. उधर भाजपा उन्हें अपने मायाजाल में उलझा कर उनके राजनीतिक जीवन को समाप्त करवाने के हर मौके तलाशेगी. हालांकि जाहिरी तौर पर वह तेज प्रताप को यहां तक उकसाने में लग चुकी है. उसे पता है कि जब तक राजद कमजोर नहीं होगा तब तक भाजपा बिहार में पनप नहीं पायेगी.

ऐसे में तेज प्रताप को अपनी पार्टी और परिवार से जुड़े मुद्दे को घर के अंदर सुलझा कर याथाशीघ्र सक्रिय रूप से राजद के चुनावी अभियान का हिस्सा बन जाना चाहिए. तेज प्रताप के सामने उत्तर प्रदेश का उदाहरण भी सामने है जब 2014 और 2017 के चुनाव में मुलायम परिवार की गलतियों के कारण आज वह पार्टी सब कुछ खो चुकी है.

 

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