तीन मामलों में खास है प्रियंका गांधी का सहारनपुर दौरा

तीन मामलों में खास है प्रियंका गांधी का सहारनपुर दौरा

चार महीने में तीसरी बार पश्चिमी यूपी पहुंची हैं प्रियंका। मंदिर भी गईं, दरगाह भी। किसान महापंचायत में उनके पहुंचते ही किसान आंदोलन एक नए दौर में पहुंच गया।

कुमार अनिल

प्रियंका गांधी चार महीने में तीसरी बार पश्चिम उत्तर प्रदेश पहुंची हैं। अक्टूबर में हाथरस में पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंची थी। हाल में वह रामपुर में उस किसान के घर पहुंची थीं, जिनकी 26 जनवरी को किसान आंदोलन के दौरान मौत हो गई थी। आज वे सहारनपुर पहुंची हैं।

देश में कई बड़े आंदोलनों की शुरुआत किसी एक तबके की मांगों से हुई है। 1974 का आंदोलन छात्रों की मांगों पर शुरू हुआ था, पर देखते-देखते वह जन आंदोलन में बदल गया। जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। सवाल यह है कि किसान मुद्दे पर प्रियंका के मैदान में उतरने का क्या असर पड़ेगा।

प्रियंका गांधी के किसान महापंचायत में पहुंचने के तीन खास महत्व हैं। अबतक किसान आंदोलन किसानों के मुद्दों पर किसान संगठनों द्वारा संचालित था। अब किसान आंदोलन में राजनीतिक दल भी कूद पड़े हैं। प्रियंका के सहारनपुर किसान पंचायत में पहुंचने का पहला अर्थ यह है कि अब किसान आंदोलन राजनीतिक आंदोलन भी बन गया है। इसे जन आंदोलन बनना अभी भी शेष है। देखना होगा कि कांग्रेस अन्य तबकों को अपने अभियान से कैसे जोड़ती है।

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प्रियंका गांधी का सहारनपुर में जिस तरह स्वागत हुआ और उन्हें सुनने के लिए भी अच्छी भीड़ जमा हुई, इसका अर्थ है कि पश्चिम यूपी में सामाजिक तौर पर नए राजनीतिक समीकरण की संभावना जमीन पर आकार ले रही है। देखना होगा कि सपा, रालोद और कांग्रेस कितना करीब आते हैं और किसानों की नाराजगी को किस तरह नया आयाम देते हैं।

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हाथरस पहुंचने में प्रियंका को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। इस बार भी सहारनपुर में धारा 144 लगाई गई, लेकिन प्रियंका के रास्ते में वैसी रुकावट सरकार ने पैदा नहीं कि जैसा हाथरस में देखा गया था। इसका अर्थ है कि यूपी की योगी सरकार के तेवर नरम पड़े हैं।

कोई भी जनता का आंदोलन समाज को जोड़ता है। इस आंदोलन ने भी सभी जातियों-धर्मों के किसानों को एक मंच पर ला दिया है, जिसे मुजफ्फरनगर की पहली महापंचायत से लेकर आज हुई सहारनपुर की किसान महापंचायत में देखा जा सकता है। आज प्रियंका पहले एक शकुंभरा देवी मंदिर गई, पूजा की, फिर खानगढ़ दरगाह भी पहुंचीं। स्पष्ट है वे किसान आंदोलन की जमीन पर नए राजनीतिक समीकरण को आकार देना चाहती हैं।

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