वर्चुअल रैली के बाद,क्यों नर्वस हैं नीतीश ?

वर्चुअल रैली के बाद,क्यों नर्वस हैं नीतीश ?

अगर जदयू की वर्चुअल रैली से कोई सबक लिया जा सकता है तो वह यह है कि बिहार चुनाव जीतने के लिए युवाओं का वोट निर्णायक होगा और उनकी समस्याएं जैसे बेरोज़गारी एवं पलायन वर्चुअल नहीं बल्कि रियल है.

शाहबाज़ की इनसाइड पोलिटिकल स्टोरी

जदयू ने वर्चुअल रैली के साथ बिहार में चुनावी शंखनाद किया लेकिन लोगो ने इसे नापसंद कर सन्देश दिया की अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में युवाओं के प्रमुख मुद्दों को हलके में लिया तो यह गलती 2020 चुनाव में भारी पड़ सकती है।

जदयू की वर्चुअल रैली “निश्चय संवाद” फ्लॉप साबित हुई. पार्टी ने जहाँ डिजिटल चुनाव प्रचार के सहारे वोटरों तक बात पहुँचाने को तरजीह दी लेकिन जिस तरह इसे सोशल मीडिया पर डिसलाइक मिले और इस प्रोग्राम को जितने दर्शक मिले इससे इस बात के संकेत मिलते है की राज्य का युवा वर्ग फिलहाल NDA गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभर रहा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सोशल मीडिया पर युवाओं के कैंपेन स्टाइल में बेरोज़गारी,कोरोना महामारी, बाढ़ और अपराध जैसे मुद्दों पर बिहार सरकार की आलोचना करने को लेकर काफी असहज हो चुके है. पार्टी के सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं से कहा था राज्य के युवा वर्ग को लालू राज के 15 साल के बाद बिहार में नीतीश कुमार के कार्यकाल में जो बदलाव हुए उन्हें युवा वर्ग में प्रचारित किया जाये।

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जदयू द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “निश्चय संवाद” कार्यकर्म द्वारा लगभग 25 लाख लोगो के साथ जुड़ने की योजना बनायीं गयी थी. लेकिन पहले तो इस वर्चुअल प्रोग्राम में कम लोगो ने हिस्सा लिया वही दूसरी तरफ इस पर मिले डिसलाइक से नीतीश कुमार के बिहार में अलोकप्रिय होने के संकेत मिले है.

बता दें कि “बिहार तक” चैनल द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा निश्चय संवाद कार्यकर्म को सोशल मीडिया साइट यूट्यूब पर लगभग दस गुना ज़्यादा लोगो ने नापसंद क्या। खबर लिखे जाने तक इस वीडियो को 1900 लाइक मिले जबकि 9500 लोगो ने डिसलाइक किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ट्विटर पर 5.9 मिलियन फोल्लोवेर्स है. दरअसल सोशल मीडिया पर युवा काफी सक्रिय रहते है और हाल के दिनों में युवा वर्ग में बेरोज़गारी को लेकर काफी असंतोष है.

गौरतलब है कि हाल ही में पूर्व भाजपा नेता एवं पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा था कि बिहार में सरकारी खर्च पर चुनाव प्रचार क्यों हो रहे है ? एक संवाददाता सम्मलेन को सम्भोधित करते हुए उन्होंने कहा था जदयू द्वारा बिहार में डिजिटल वैन से अगर हर एक पंचायत में चुनाव प्रचार कराने पर लगभग 70 करोड़ खर्च होंगे। उन्होंने बिहार में कोरोना के समय चुनाव कराने के औचित्य को लेकर भी सवाल उठाये थे.

राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो “निश्चय संवाद” के बाद जदयू को अपनी चुनावी रणनीति में युवाओं के महत्व को बढ़ाना होगा। क्यूंकि यह युवा वर्ग जिसमे 18 से 25 वर्ष के युवा है वह बिहार की तुलना बिहार से करने में यकीन नहीं रखते। उन्हें रोज़गार और सुविधा चाहिए न की लालू राज की घुट्टी। बिहार चुनाव को देखते हुए जदयू एवं NDA गठबंधन ने लालू राज की खामियों को चुनाव अभियान बना दिया जिससे युवा वर्ग खासा नापसंद कर रहा है.

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सोशल मीडिया पर नीतीश के खिलाफ उबाल

देश के युवा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते है बिहार के युवा भी सोशल मीडिया पर प्रचारित राजनीतिक खबरों को काफी तरजीह देते है. लेकिन यहाँ नीतीश विरोधी बाज़ी मारते हुए दीखते है. बिहार में सोशल मीडिया पर नीतीश सरकार की नाकामियों की काफी चर्चा रहती है जिसमे रोज़गार,पलायन, कोरोना महामारी के बाद राज्य में उपजे हालात और बिहार में होते अपराध की काफी चर्चा रहती है. जिसके कारण युवा नीतीश सरकार के तमाम दावों और राज्य में संरचनात्मक बदलाव के बावजूद बिहार सरकार की जमकर आलोचना कर रहे है. ये युवा वर्ग लालू राज की कहानी नहीं बल्कि अपने राज्य के भविष्य की परवाह करता है. रोज़गार का मुद्दा उनके भविष्य के साथ जुड़ा है इसलिए इसपर हंगामा मचना लाज़मी है.

युवा Vs वरिष्ठ

बिहार में युवा नेता युवा वोटरों पर खासी पकड़ रखते है. राजद के तेजस्वी यादव, सीपीआई के कन्हैया कुमार, लोजपा के चिराग पासवान और आज़ाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आज़ाद सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय है. जहाँ एक तरफ नीतीश विरोधी खेमे में प्रभावित करने वाले युवा नेता है वही NDA गठबंधन के प्रमुख दल जदयू में वरिष्ठ नेताओं का कब्ज़ा रहा है. प्रशांत किशोर भी अब जदयू का हिस्सा नहीं है. वही वरिष्ठ नेता सोशल मीडिया को तरजीह नहीं देते जिससे इस प्लेटफार्म पर फिलहाल जदयू की वज़न हल्का है. जदयू में ऐसे नेताओं की भी कमी है जो सोशल मीडिया में एक्टिव रहते है एवं युवा वर्ग को लुभा सकते है.

प्रवासी मज़दूरों का असंतोष

कोरोना महामारी के दौरान बिहार के ही प्रवासी मज़दूरों ने सबसे ज़्यादा सितम झेले। लॉकडाउन के दौरान राज्य सरकार ने भी उन्हें वापस लाने से इंकार कर दिया था. जिससे उनमे असंतोष फैला। बात सिर्फ इतनी नहीं है प्रवासी मज़दूर जब बिहार वापस आये तो राज्य में रोज़गार की स्थिति देख कर वापस होने का मन बनाया। अब यह वर्ग अपने सगे सम्बन्धियों से भी बिहार में राजनीतिक बदलाव के लिए वोट करने की अपील कर रहा है.

मुस्लिम एवं दलित राजनीति का चैलेंज

बिहार में मुस्लिम वर्ग लगभग 18 % है. इस वर्ग में नयी राजनीतिक चेतना आयी है. मुस्लिम समाज अब अपनी राजनीति, अपनी पार्टी और अपना नेता के विचार पर अग्रसर है. जिससे न सिर्फ जदयू बल्कि राजद का भी वोट बैंक खिसकेगा। वही दूसरी तरफ दलित वर्ग भी अब एक युवा असरदार आवाज़ की तलाश में है. यह कहने की ज़रुरत नहीं है की दोनों वर्ग अपनी अलग राह पकड़ेंगे।

एंटी इंकम्बेंसी (Anti-incumbency)

यह एक नेचुरल फेनोमेना है जिसमे लम्बे समय तक सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ जनता में उबाल आ जाता है और लोग बदलाव चाहने लगते है. लेकिन जब इसके साथ कई और फैक्टर्स जुड़ जाए तो सत्ताधारी पार्टी की जीत मुश्किल हो जाती है. जदयू की दोहरी समस्या है, एक तरफ नीतीश सरकार पर घोटालों के आरोप लगे है जैसे यूटेरस घोटाला और सृजन घोटाला तो दूसरी तरफ जदयू की सहयोगी पार्टी भाजपा को मुस्लिम समाज पसंद नहीं करता है. ज़ाहिर है इसका नुक्सान जदयू को ही उठाना होगा।

अगर जदयू के वर्चुअल रैली से कोई सबक लिया जा सकता है तो वह यह है की बिहार चुनाव जीतने के लिए युवाओं का वोट निर्णायक होगा और उनकी समस्याएं जैसे बेरोज़गारी एवं पलायन वर्चुअल नहीं बल्कि रियल है. अब नीतीश सरकार के पास यह अवसर है की राज्य के युवा वर्ग को पहले तो सकारात्मक नज़रो से देखे और उनके अनुसार अपनी रणनीति में बदलाव करे.

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