बिना बोले की राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को बुरी तरह पछाड़ा

बिना बोले की राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को बुरी तरह पछाड़ा। सबकी नजर राहुल पर थी कि वे क्या बोलते हैं, पर वे आज नहीं बोले। भाजपा की रणनीति फेल।

इर्शादुल हक, संपादक, नौकरशाही डॉट कॉम

लोकसभा में मगंलवार को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई। पहले से कांग्रेस ने घोषणा कर रखी थी कि राहुल गांधी आज 12 बजे बोलेंगे। पूरा देश इंतजार कर रहा था। उनके नहीं बोलने से भाजपा की सारी रणनीति धराशायी हो गई। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में नहीं आए, जबकि अविश्वास प्रस्ताव पर उन्हें सदन में मौजूद रहना चाहिए था। शायद भाजपा की रणनीति यह थी कि मंगलवार को जब राहुल गांधी बोलेंगे, तब प्रधानमंत्री सदन में न रहें, इससे राहुल गांधी के हमले से वे बच जाएंगे साथ ही राहुल के भाषण का असर भी कम हो जाएगा। भाजपा ने निशिकांत दुबे को खड़ा किया। निशिकांत दुबे मुद्दे को छोड़कर हर चीज पर बोले। मुद्दा था, मणिपुर प्रधानमंत्री क्यों नहीं गए। मणिपुर पर मुंह खोलने में 80 दिन क्यों लगाए और अब तक वहां के मुख्यमंत्री को हटाया क्यों नहीं। इनमें से किसी सवाल पर निशिकांत नहीं बोले और राहुल गांधी से लेकर सोनिया गांधी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते रहे, ताकि सदन की बहस की दिशा बदल जाए।

राहुल गांधी नहीं बोलकर भी चर्चा के केंद्र में हैं। प्रधानमंत्री मोदी का सदन में नहीं आना उनकी कमजोरी ही बता रहा है। 10 अगस्त को अविश्वास प्रस्ताव के अंतिम दिन प्रधानमंत्री मोदी चर्चा का जवाब देंगे। अब माना जा रहा है कि राहुल गांधी उसी दिन बोलेंगे। सीधे प्रधानमंत्री से सवाल करेंगे।

इधर संसद में भाजपा के मंत्रियों और सांसदों ने जिस तरह ओछी भाषा का प्रयोग किया, उसकी हर तरफ से निंदा हो रही है। महाराष्ट्र से आनेवाले नेता और केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने एक विपक्षी सांसद को कहा कि चुप हो जा, तेरी औकात क्या है। बैठ, नीचे बैठ। तो यह है मोदी सरकार के मंत्री की भाषा। केंद्रीय मंत्री पियूष गोयल ने विपक्षी सांसदों को गद्दार कह दिया।

भाजपा सांसदों तथा मंत्रियों की ओछी भाषा पर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कहा-संस्कार विहीन, मर्यादाहीन भड़काऊ जनता पार्टी के नेता और मंत्रीगण संसद में गुंडे-मवालियों की तरह सड़कछाप भाषा और गाली-गलौज पर उतर चुके है। 2024 की स्पष्ट हार को देखकर ये लोकतांत्रिक मर्यादाएं, परंपराएँ, संस्कृति और स्वस्थ संवाद को छोड़, डर से बुरी तरह बौखला गए है।

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By Editor


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