मोदी युग में बड़े-बड़े नतमस्तक, कहां से मिली नीतीश को ताकत

मोदी युग में बड़े-बड़े नतमस्तक, कहां से मिली नीतीश को ताकत

ED युग में बड़े-बड़े नेता उखड़ गए। कोई मोदी-शाह से पंगा लेने की हिम्मत नहीं कर सकता। ऐसे समय नीतीश कुमार को कहां से मिली इतनी ताकत। किसे दें धन्यवाद?

कुमार अनिल

उनके इशारे पर ही आजकल पत्ता हिलता है। जिसे चाहेंगे बहुमत ना भी हो तो मुख्यमंत्री बना देंगे। चाहे तो सुबह पांच बजे भी। किसके के घर कब छापा पड़ जाए, किसे जेल भेज दिया, कहा नहीं जा सकता। मीडिया बिछा हुआ है और संस्थाएं दंतविहीन हो गई हैं। कब आपको हिंदू विरोधी, राष्ट्र विरोधी बना दिया जाए, कह नहीं सकते। ऐसे समय कोई उनके खिलाफ जाए, उनसे पंगा लेने की हिम्मत करे, ऐसा सोचना भी कठिन है। लेकिन ऐसे समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने झुकने से इनकार कर दिया, आखिर उन्हें कहां से मिली इतनी ताकत?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ताकत सत्ता में नहीं, बल्कि जनता में है। बिहार न यूपी है, न मध्य प्रदेश या गुजरात या महाराष्ट्र। बिहार की जनता हिंदुत्वाद के अतिवाद के साथ नहीं है। उस पर बुद्ध के मध्यमार्ग का असर ढाई हजार साल भी देखा जा सकता है।

भाजपा ने यूपी के बुलडोजर मॉडल को बिहार में लागू करने की कोशिश की, उसने बांग्लादेशी घुसपैठ को मुद्दा बनाने की कोशिश की, हिंदू-मुस्लिम को बांटने वाली राजनीति चालने की कोशिश की, लेकिन वह बुरी तरह असफल रही। इसीलिए शिंदे या चिराग मॉडल बिहार में कामयाब नहीं हो सका।

बिहार की ठोस राजनीतिक जमीन को देखें, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की असली ताकत दलित, अतिपिछड़े, पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्णों का लोकतांत्रिक हिस्सा है। यह समूह मिल कर इतनी जगह बना देता है कि कोई दल 70-75 सीटें जीत सकता है। बिहार में 243 विस सीटें हैं। इसमें 75 का मतलब है करीब एक तिहाई। एक तरफ राजद है, जिसके पास 79 सीटें हैं, दूसरी तरफ भाजपा है, जिसके पास 77 सीटें हैं। इस तरह बिहार में मध्यमार्ग के लिए अच्छा स्पेस है। इस स्पेस को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले 15 साल से सींचा है, मजबूत किया है। यह स्पेस, इसकी विशाल आबादी ही नीतीश कुमार की असली ताकत है।

स्पेस का महत्व होता है, लेकिन इससे नीतीश कुमार का महत्व कम नहीं हो जाता। नीतीश कुमार ने इस स्पेस को साहस के साथ फैसले लेकर राजनीतिक नेतृत्व दिया। उन्होंने लगातार हर तरह के दबाव के बाद भी अपनी जमीन नहीं छोड़ी। जमीन तो सबके लिए एक ही है, लेकिन नेतृत्व न हो तो वह जनाधार बिखर जाता है, लेकिन नेतृत्व सही हो, सही समय पर सही फैसला ले, तो यह जनाधार मजबूत होता जाता है। नीतीश कुमार ने आज की विषम राजनीतिक स्थिति में जो फैसला लिया, इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद निश्चित रूप से बढ़ा है।

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