- SIR और मतदाता सूची विवाद: सत्यापन और मताधिकार छीनने के बीच अंतर

अनिल कुमार
निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया भारत की चुनावी संस्थाओं पर जनता के भरोसे की कसौटी बन गई है। समर्थकों का कहना है कि इससे मृत, दोहरी प्रविष्टियों वाले, स्थान बदल चुके और अपात्र मतदाताओं की पहचान होगी। आलोचकों को आशंका है कि इस प्रक्रिया में प्रवासियों, गरीब परिवारों और दस्तावेज जुटाने में असमर्थ लोगों के नाम भी कट सकते हैं। दोनों चिंताएं जांच की मांग करती हैं।
SIR कोई नई प्रक्रिया नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत निर्वाचन आयोग चुनावों का संचालन करता है। हालांकि, मतदाता बनने की पात्रता नागरिकता, उम्र और सामान्य निवास जैसी कानूनी शर्तों पर निर्भर करती है। आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसके फैसले न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक जांच से परे हैं।
दिल्ली के आंकड़े विवाद की गंभीरता बताते हैं। 31 अगस्त 2026 को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में लगभग 97.53 लाख मतदाता थे, जबकि पुनरीक्षण से पहले यह संख्या 1.45 करोड़ थी। करीब 47.56 लाख नाम मसौदा सूची में नहीं दिखे, यानी लगभग 33 प्रतिशत की कमी। आयोग ने अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य मामलों को इसके कारणों में गिनाया। लेकिन मसौदा सूची से नाम गायब होना अंतिम निष्कासन का प्रमाण नहीं है। केवल गणना फॉर्म जमा नहीं होने से भी किसी व्यक्ति को अपात्र नहीं माना जा सकता।
यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। दोहरी प्रविष्टि, मृत मतदाता, स्थान बदल चुका व्यक्ति और गैर-नागरिक अलग-अलग श्रेणियां हैं, जिनके लिए अलग प्रमाण चाहिए। 9 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध आंकड़े SIR के जरिए अवैध प्रवासियों की देशव्यापी सत्यापित संख्या स्थापित नहीं करते। इसलिए सूची से गायब सभी नामों को फर्जी या विदेशी मतदाता बताना भी भ्रामक होगा और हर हटाए गए नाम को पात्र नागरिक का मान लेना भी तथ्यों से आगे जाना होगा।
निर्वाचन आयोग ने ऑनलाइन सेवाओं, दावे-आपत्ति की प्रक्रिया, अधिकारियों के सत्यापन और अतिरिक्त नामांकन अभियानों जैसे उपाय किए हैं। अक्टूबर की शुरुआत तक दिल्ली में 10.28 लाख से अधिक नोटिसों का निपटारा किया जा चुका था। विशेष शिविर और अतिरिक्त सहायता भी आयोजित की जा रही थी। हालांकि, इन उपायों की असली सफलता इस बात से तय होगी कि पात्र मतदाता कितनी आसानी से अपना नाम वापस जुड़वा पाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सवालों ने भी विवाद को गंभीर बनाया है। 5 अक्टूबर को अदालत ने पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। अगले दिन अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म-6 के संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी थी और ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव की अनुमति से संबंधित रिकॉर्ड मांगे। आयोग का कहना है कि वैधानिक फॉर्म में संशोधन नहीं हुआ और विवादित घोषणा SIR से जुड़ी अलग शर्त थी। अब इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोपों के बजाय दस्तावेजी स्पष्टीकरण जरूरी है।
व्यावहारिक कठिनाइयां भी कम नहीं हैं। बूथ स्तर के अधिकारी जब पहुंचते हैं, तब प्रवासी मजदूर काम के सिलसिले में बाहर हो सकते हैं। बेघर लोगों और अनौपचारिक बस्तियों में रहने वालों को ढूंढना कठिन हो सकता है। नाम, उम्र या पारिवारिक रिकॉर्ड में अंतर होने पर भी नोटिस जारी हो सकते हैं। अपील की व्यवस्था तभी प्रभावी है, जब नागरिकों को स्पष्ट सूचना मिले, आवश्यक प्रमाण की जानकारी हो और वे बिना भारी खर्च या देरी के संबंधित अधिकारी तक पहुंच सकें।
इसलिए विपक्ष की पारदर्शी मानदंडों, स्वतंत्र जांच योग्य आंकड़ों और मनमाने नाम कटने से सुरक्षा की मांग उचित है। लेकिन जानबूझकर राजनीतिक हेरफेर के आरोपों को भी प्रमाणित करना होगा; केवल कुल आंकड़ों से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे और केरल हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पी.एन. रवींद्रन का तर्क है कि बिना प्रमाण आरोप लगाकर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर नहीं करनी चाहिए और प्रभावित मतदाताओं को कानूनी उपाय अपनाने चाहिए। यह सिद्धांत महत्वपूर्ण है, लेकिन कानूनी उपाय और सार्वजनिक जवाबदेही एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग को अपने फैसलों का स्पष्ट स्पष्टीकरण देना होगा।
SIR की असली परीक्षा केवल यह नहीं कि कितने
नाम हटे, बल्कि यह है कि हर नाम हटाने का कानूनी आधार हो, पात्र मतदाता अपनी गलती प्रभावी ढंग से सुधार सकें और अंतिम सूची पहले से अधिक सटीक साबित हो। चुनावी ईमानदारी के लिए अपात्र मतदान रोकना और हर पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना—दोनों जरूरी हैं। एक के लिए दूसरे की बलि नहीं दी जा सकती।
