आज
By Irshadul Haque
राहुल के आंदोलन की रणनीति में बड़ा बदलाव दिखेगा। यह नए लेवल की रणनीति है जिसे पॉलिटिकल लीडर कत्तई नहीं अपनाते। आज से पहले, भारत के किसी विपक्षी लीडर ने ऐसा कदम उठाया, मुझे याद नहीं।
राहुल के नेतृत्व में इंडिया ब्लॉक आज सुप्रीम कोर्ट मार्च करेगा। इसके लिए अदालत को औपचारिक रूप से सूचित किया गया है। अब तक अपनी मांगों के लिए सरकारों, राज्यपालों या राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने की परंपरा रही है। अदालत को, या यूं कहें सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को ज्ञापन सौंपने की परंपरा नहीं रही।
तो फिर राहुल ने यह स्ट्रेटजी क्यों अपनाई ? यह लाजिमी सवाल है। मैं समझता हूं कि यह कदम राहुल ने बड़े सोच-विचार के उठाया है।
दरअसल पिछले एक दशक में तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर से जनमानस का विश्वास घटा है। लोकतंत्र कुचला गया है। चुनाव आयोग हो या अन्य स्वायत्तता प्राप्त संस्थाएं सब सत्ता के इशारे पर नाच रही हैं। ऐसे में न्यायपालिका ही है, जो लोकतंत्र को बचा सकती है। लेकिन न्यायपालिका के प्रति जो भरोसा आम जन को होना चाहिए, वह भरोसा भी कमजोर हुआ है। अदालत की निष्पक्षता के प्रति आम लोगों में नकारात्मक परसेप्शन मजबूत हुआ है।
अदालत के प्रति इसी परसेप्शन को राहुल आम लोगों में विस्तार दे कर अदालत को उसकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाना चाहते हैं।
जस्टिस सूर्यकांत ने लिखा ईमेल
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इस बीच खबर आई है कि चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने राहुल के डेलिगेशन से मिलने को यह कहते हुए इंकार किया है कि जो मुद्दे वह उठा रहे हैं, वे पहले से ही अदालत में विचाराधीन है। जस्टिस सूर्यकांत ने ईमेल किया है। संभव है कि चीफ जस्टिस का यह फैसला तकनीकी रूप से उचित हो। राहुल भी यह बखूबी समझते हैं। लेकिन एक राजनीतिक आंदोलनकारी का असल टारगेट जनता होती है। वह अपने हर एक्शन का निशान जनमानस को लक्षित कर के उठाता है। ऐसे में राहुल सुप्रीम कोर्ट मार्च से जो लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं, उसमें वह सफल होते दिख रहे हैं, चाहे चीफ जस्टिस उनसे मिलें या न मिलें। दरअसल राहुल यह संदेश देना चाहते हैं कि अदालत को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक सक्रिय और अधिक संवेदनशील होना चाहिय। राहुल इस मार्च से अपना मकसद पूरा होता हुआ देख रहे हैं।
बहनों भाइयों! आप मेरी बात से असहमत हैं तो जरूर बताइए।
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