इंजीनियर बनने का जुनून-2: करोड़ों की लूट और जीवन बरबाद करते हैं कोचिंग संस्थान- अम्बर

लेख के पहले पार्ट में आपने पढ़ा कि सीबीएससी की खतरनाक पालिसियों से लाखों छात्र इंजीनियर बनने का सपना तो पालते हैं पर अधिकतर के सपने उन्हें नाकामी की गर्त में ढकेल देते हैं. इस पार्ट में पढिये कि कैसे सीबीएससी की गलत नीतियों का लाभ उठा कर कोचिंग संस्थान इंजीनियर बनने का सपना बेच कर न सिर्फ छात्रों-अभिभावकों को लूट रहे हैं बल्कि की उनकी जिंदगी भी बरबाद कर रहे हैं.

ओवैस अम्बर

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कोंचिंग संस्थान अपनी इस साजिश में कामयाब हो चुके हैं जिसके चलते वे छात्रों को वरगलाते हैं कि कोचिंग ज्वायन करने से ही सफलता हासिल की जा सकती है. क्या देश के सारे छात्र आईआईटी या एनआईटी में प्रवेश पा सकते हैं? अगर नहीं तो फिर कोचिंग संस्थान इतना हो हल्ला क्यों मचाते हैं. क्या सीबीएससी अपनी इस जिम्मेदारी से मुंह मोड सकता है कि 15 लाख बच्चों की अभिरूचि आईआईटी, एनआईटी में ही क्यों रहती है? इससे निराश छात्र अपनी ही मेधाशक्ति को कोसते हैं और आखिरकार अपनी असफलता पर निराश व हताश हो के रह जाते हैं. और इस नाकारत्मकता के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह सीबीएससी ही है.

इंजीनियर बनने का जुनून-1 :सीबीएससी बरबाद कर रहा है लाखों छात्रों का जीवन

 

और उधर कोचिंग संस्थान सीबीएससी की इसी व्यवस्था का लाभ उठा कर बच्चों को इंजिनियर बनाने का ख्वाब दिखा कर उनका मानसिक व आर्थिक दोहन कर करोड़ों – अरबों रुपये का कारोबार करते हैं. अगर यह सिलसिला जारी रहा तो शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो के रह जायेगी. इसी तरह आईआईटी की चाह में सालों तक संघर्ष करने के बाद असफल छात्र बीएससी भी नहीं कर पाते और उनका जीवन नर्क बन के रह जाता है.

 

उधर कोचिंग की दुकानदारी का आलम यह है कि वह अनेक तरह के प्रलोभनों से छात्रों को अपने जाल में फंसा लेते हैं. इसके लिए कोचिंग संस्थानों ने दलाली की ऐसी संस्कृति वकिसित कर रखी है कि छोटे शहरों और गांवों से वह छात्रों को सफलता के सपने दिखा कर खीच लाते हैं और उनसे लाखों रुपये ऐंठ लेते हैं. ये दलाल पहले तो उनके अंदर महत्वकांक्षा को इतना जगाते हैं कि वह बार-बार इंजिनियरिंग की प्रतियगिता परीक्षा में शामिल होते रहते हैं ज्यादातर बच्चे असफल हो कर रह जाते हैं. इस दौरान उनका न सिर्फ करियर चौपट हो के रह जाता है बल्कि बदले में वह तनाव और निराशा के शिकार हो जाते हैं.

 कोचिंग संस्थानों का रैकेट

 

कुछ कोचिंग संस्थान अपने कारोबार को चमकाने के लिए अनैतिकता की हदों को भी पार कर जाते हैं. इसके लिए, बताया जाता है कि कुछ संस्थानों के दिये प्रश्न पत्र के आधार पर ही प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्नपत्र तैयार किये गये थे. 2007-08 में इस तरह का हंगामा हुआ था जब एआईपीएमटी और आईआईटी प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्नपत्र कोचिंग संस्थान के प्रश्नपत्र से हू ब हू मेल खा रहे थे. एक बार जो कोचिंग संस्थान इस तरह का कथित डील कर ले तो उसकी प्रतिष्ठा कोचिंग की दुनिया में काफी बढ़ जाती है और नतीजा यह होता है कि इसी के बूते वे हजारों छात्रों को फंसा लेते हैं और उनसे करोड़ो रुपये की कमाई करते हैं.

सफल छात्रों को पैस दे कर अपने संस्थान का छात्र बताने का भी खेल

कोई कोचिंग संस्थान अपने स्टडी मैटेरियल को मुंहमांगी कीमत पर छात्रों को बेचते हैं. कोचिंग संस्थानों के इस खेल का संजाल अब तो देश के छोटे शहरों तक फैल चुका है. ये संस्थान इसके अलावा कई और खेल खेलते हैं. वे वैसे छात्रों से भी सौदा करते हैं जो अपने बूते सफलता प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें अपने मोहजाल में फंसा कर उन पर अनैतिक दबाव बना कर उन्हें अपना छात्र घोषित करते हैं और अखबारों में सफल छात्रों की फोटो वला विज्ञापन छपवा कर देश भर के छात्रों को प्रलोभन देते हैं कि उनके यहां कोचिंग करने वाले छात्र निश्चित तौर पर सफल होते हैं.

इस भ्रमजाल में वसे लाखों छात्र फंस जाते हैं और इस तरह वे करोड़ो की कमाई तो करते ही हैं, छात्रों का जीवन भी बरबाद करते हैं. सवाल यह है कि हमारे देश में सीबीएससी की गलत नीतियों और कोचिंग संस्थानों के लूट तंत्र ने लाखों छात्रों को बरबादी के कगार पर धकेल दिया है. अब समय है कि कुछ ऐसे नीतिगत फैसलेै लिये जायें ताकि हम अपनी नयी पीढ़ी को बचा सकें, देश के शिक्षा ढांचें को बचा सकें.

लेखक करियर कंसलटेंट व रोजमान एजुकेशनल ऐंड चरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन हैं

One comment

  1. Abusing any sector like this and painting all organizations with the same brush is utterly disgusting and outrageous. Just like any other field corruption and malpractices are rampant in this system too, but talking in the way the author is putting things forward is quite foolish. Highlight the malpractices and the culprits. Regulate the system but you can’t say that coaching institutes do nothing but loot. The good institutions provide yearlong rigorous classroom interactions with such quality of teachers which none of the school of this country provides. There are lots of positive sides of this industry.

    By the way many charitable trusts have done great level of corruption and have eaten up funds given for different purposes. So I can presume that the author being chairman of some trust is also of the same kind.

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