एडिटोरियल कमेंट:सर्वस्वीकार राजनीति के नजीर हैं नीतीश

नशामुक्ति के पक्ष में विश्व की सबसे बड़ी मानव श्रृंखला का इतिहास रचने के पहले भी नीतीश कुमार दो ऐसे अभियान चला चुके हैं जिनके पक्ष मेंं उनके विरोधियों को भी साथ आना पड़ा. सर्वस्वीकार राजनीति की ऐसी मिसालें आसानी से नहीं मिलतीं.nitish-kumar

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

यह भी एक राजनीति है जो विरोधियों को भी अपना कायल और अपना पक्षधर बना दे. वरना राजनीति का पारम्परिक अर्थ यही रहा है कि विरोधियों को निशाना बनाओ और आगे बढ़ो. लेकिन नीतीश कुमार इस मामले में आउटस्टैंडिंग साबित होते रहे हैं. नशामुक्ति के पक्ष में उनके विरोधी भी उनके साथ आये. हाथ से हाथ जोड़ा और कतार में खड़े हो गये. फिर नतीजा सामने था.11 हजार 400 किलो मीटर की लम्बी लाइन बनी और विश्व रिकार्ड कायम हो गया.

नीतीश की राजनीति की यही सफलता है कि विरोधी भी साथ खड़े हो जायें. नशामुक्ति अभियान पर नीतीश ने यह साबित  कर दिया.इससे पहले भी नीतीश कुमार सर्वस्वीकार राजनीतिक मुद्दे उठा चुके हैं. 2002 में उन्होंने हाजीपुर में रेलवे का पूर्वी जोन कार्यालय खोलवाने के कामयाब अभियान चला चुके हैं. तब बिहार विधान सभा और विधान परिषद ने सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था. तब नीतीश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे. इस अभियान ने सफलता प्राप्त की और हाजीपुर में रेलवे का अलग जोन कायम हो सका.

तब भी पूरा बिहार आया था साथ

नीतीश की सर्वस्वीकार राजनीति की दूसरी मिसाल बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग थी. 2005 में मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद उन्होंने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का अभियान शुरू किया. नतीजा हुआ कि एक एक कर तमाम राजनीतिक पार्टियां उनके साथ आ गयीं. तब राजद विपक्षी दल हुआ करता था. भाजपा नीतीश के साथ थी. राजद ने भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा अभियान में समर्थन दिया.  तब फिर बिहार की असेम्बली ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया और मांग की गयी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाये. इन दो मुद्दों के बाद  नशामुक्ति के पक्ष में विश्व की सबसे बड़ी इंसानी जंजीर बना कर नीतीश ने अपनी सर्वस्वीकार राजनीति का फिर लोहा मनवा दिया है.

नीतीश के इन तीन अभियानों पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि विपक्षी पार्टियां बेबसी में उनके साथ आ जाती हैं. यह बेबसी ऐसी कि  कि अगर वे इन अभियानों का विरोध करें तो वे या तो राज्य की विरोधी करार दी जायें या समाज विरोधी घोषित कर दी जायें. ऐसे में विरोधियों के पास चुप्पी साधने का ही विकल्प बचता है. पर चुप्पी का  अपना जोखिम है. इसलिए क्या विपक्ष और क्या सत्ता पक्ष सब उनके साथ खड़े हो गये. शराबबंदी पर तो खुद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा कि नीतीश ने सामाजिक बदलाव लाने का जो साहस किया है वैसा साहस हर आदमी नहीं लेता.

नीतीश की ये राजनीति एक नजीर है. जो उन्हें औरों से अलग करती है.

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