एडिटोरियल: नालंदा युनिवर्सिटी के सारे पुरोधाओं को ध्वस्त कर संघ लॉबी ने ऐसे जमाया कब्जा

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात नालंद युनिवर्सिटी पर भगवा ध्वज लहराने के लिए एनडीए सरकार का दो वर्षीय अभियान पूरा हो चुका है. यह अभियान आरएसएस प्रचारक डा. विजय भटकर को युनिवर्सिटी का चांसलर नियुक्त करने के साथ पूरा हुआ.

ना, वि.वि के चांसलर विजय भटकर आरएसएस के विज्ञान भारीत के अध्यक्ष भी हैं

ना, वि.वि के चांसलर विजय भटकर आरएसएस के विज्ञान भारीत के अध्यक्ष भी हैं

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने युनिवर्सिटी के विजिटर की हैसियत से डा. भट्कर की नियुक्ति 25 जनवरी के प्रभाव से कर दी है. भटकर इस पद पर तीन साल तक बने रहेंगे.

 

नालंदा युनिवर्सिटी, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एजपीजे अब्दुल कलाम के दिमाग की उपज थी. उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस बात के लिए राजी किया था कि प्राचीन नालंदा के गौरव को वापस लाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की युनिवर्सिटी बनायी जाये. नीतीश ने उनके इस आइडिया को पकड़ा. और 2006-7 से एक कारवां चल पड़ा. इसे संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिली और इसके लिए चीन, थाइलैंड, लाओस ओर कुछ हद तक जापान समेत अनेक देशों की मदद मिली. फिर यह सपना 2010 में साकार हो सका. नोबल पुरुस्कार विजेता अमृत्य सेन इसके चांसलर बनाये गये. 2014 में युनिवर्सिटी के पहले सत्र की शुरुआत हो गयी.

 

लेकिन 2015 आते-आते इस युनिवर्सिटी के पदाधिकारियों का दम घोटा जाने लगा. अमृत्य सेन पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाये जाने लगे. इस दमघोटू माहौल से तंग आ कर अमृत्य सेन के फरवरी 2015 में चांसलर पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद जार्ज यो को इस पद की जिम्मेदारी दी गयी लेकिन उन्हें भी चलता करने की तैयारी की जा चुकी थी. सो उन्हें भी जाना पड़ा.

नालंदा युनिवर्सिटी पर पकड़ मजबूत करने के लिए नालांदा युनिवर्सिटी एक्ट में संशोधन किया गया. और इसके गवर्निंग बोर्ड से लार्ड मेघनाथ देसाई जैसे अर्थशास्त्रियों को भी रास्ते हटाया गया.

 

इतना ही नहीं  इस युनिवर्सिटी पर बिहार सरकार की पकड़ को भी कम से कम कर दिया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री नीतीस कुमार ने भी मजूबर हो के इस युनिवर्सिटी के प्रति अपनी दिलचस्पी कम कर ली. युनिवर्सिटी के बोर्ड में बिहार के दो सदस्य होते हैं जिन्हें हटा कर नये बोर्ड में भाजपा सांसद एनके सिंह को जगह दी गयी.

अब नालंदा युनिवर्सिटी का लोकतांत्रिक स्वरूप लगभग खत्म हो चुका है. इसके फाउंडिंग मेम्बर देशों में से चीन,आस्ट्रेलिया, थाइलैंड और लाओस को भी दूध की मक्खी की तरह बाहर किया जा चुका है. और इस क्रम में  आरएसएस प्रचारक डा. भटकर की नियुक्ति आसएसएस लॉबी की दो साल की मेहनत के परिणाम के रूप में सामने आ चुकी है.

ऐसे में नवनियुक्त चांसलर भटकर के बारे में जानना चाहिए. नालांदा युनिवर्सिटी की वेबसाइट पर डॉ भटकर के बारे में विस्तार से लिखा गया है जिसमें उन्हें सुपर कम्प्युटर का भारतीय मसीहा घोषित किया गाया है. लेकिन सबसे खास बात यह है कि भटकर आरएसएस के संगठन विज्ञान भारती के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं.

नालांदा युनिवर्सिटी की शुरुआत जिस मकसद से की गयी थी उनमें से एक यह भी था कि देश में बौद्ध संस्कृति, इतिहास और उससे संबंधित ज्ञान को सहेजना. थाइलैंड चीन जैसे देशों की दिलचस्पी इन्हीं कारणों से इस युनिवर्सिटी में जागी थी. लेकिन अब इस युनिवर्सिटी पर भगवा रंग गहराई से चढ़ चुका है.

 

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