तो NDA टूटेगा या तो कुशवाहा बाहर जायेंगे या फिर नीतीश

तो सवाल यह है कि NDA टूटेगा. इस गठबंधन से या नीतीश बाहर जायेंगे या फिर उपेंद्र कुशवाहा. वैसे ज्यादा संभावना कुशवाहा के बाहर जाने की है.

Nitish Kumar-Upendra Kushwaha

नीतीश ने नाराज कुशवहा को राज्यसभा में भेजा था पर यह दोस्ती ज्यादा नहीं चली( फाइल फोटो)

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Irshadul Haque, Editor naukarshahi.com

तो NDA के टूटने के मुतल्लिक बिहार के राजनीतिक गलियारे में चर्चा प्रबल होती जा रही है.

2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व NDA  में सीटों के बंटवारे के गणित पर जोरदार चर्चा जारी है. एक प्रस्तावित फार्मुले के मुताबिक भाजपा राज्य की कुल चालीस में से 20 पर चुनाव लड़ेने पर अड़ी है. नीतीश की पार्टी को 12 सीटें दी जा रही हैं जो उसे मंजूर नहीं. उधर  उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को मात्र 2 सीट पर टरका देने की कवायद जारी है. 2014 में वह NDA  में रहते हुए 3 सीटों पर लड़ी थी. कुशवाहा को भी यह मंजूर नहीं. उधर जदयू यह मान कर चल रहा है कि कुशवाहा NDA  छोड़ेंगे. जदयू के नेता यह कानाफूसी करने लगे हैं कि 12 सीटें देने पर भाजपा अड़ी तो नीतीश अलग राह अपनायेंगे. वह NDA  छोड़ कर एकला चलो की नीति अपना सकते हैं.

 

NDA में नीतीश और कुशवाहा एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं करते

 

हालांकि यह कानाफूसी दबाव की राजनीति का हिस्सा है. दूसरी तरफ जदयू इस कोशिश में है कि आरएलएसपी को NDA  से धकिया दिया जाये. यानी तब NDA टूटेगा. क्योंकि जब नीतीश ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA  छोड़ दिया था तो आरएलएसपी  NDA  का हिस्सा बन गयी थी. अब जदयू का तर्क है कि वह  भाजपा गठबंधन में वापस आ गया है तो आरएलएसपी की कोई जरूरत नहीं है. इस बात का पूरा आभास उपेंद्र कुशवाहा को है. तभी तो कुशवहा तबसे नीतीश पर हमलावर हैं जब से वह NDA  में वापस आये हैं. नीतीश और कुशवाहा कि 2013 के बाद कभी नहीं बनी. 2012 में नीतीश ने जदयू से कुशवाहा को निलंबित करवा दिया था. तब जदयू की बागडोर शरद यादव के हाथ में थी. हालांकि तब कुशवाहा राज्यसभा के सदस्य थे.  इसके बाद उन्होंने राज्यसभा से त्याग पत्र दे दिया. नीतीश को डिक्टेटेर बताते हुए जदयू और राज्यसभा दोनों से त्यागपत्र दे दिया. करीब छह महीने के बाद ऐतिहासिक गांधी मैदान में रैली करके उन्होंने अलग पार्टी आरएलएसपी बनाने की घोषणा कर दी.

 

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NDA  में नीतीश की वापसी कुशवाहा को फूटी आंखें भी नहीं सुहाई थी. यही कारण है कि जब नीतीश ने अपने कैबिनेट का विस्तार किया तो आरएलएसपी उसका हिस्सा नहीं बनी. आरएलएसपी के विधान सभा में 2 सदस्य हैं.

NDA  टूटेगा ?

अब जैसे हालात बनते जा रहे हैं, उससे यह आभास मिलता जा रहा है कि NDA  में विघटन तय है. भले ही देर हो या सबेर. नीतीश के भरोसेमंद शह-मात का खेल शुरू कर चुके हैं. एक तरफ वह भाजपा को घिड़की दे रहे हैं कि उसे 12 सीटों पर लड़ना मंजूर नहीं. दूसरी तरफ वे अपने लिए सबसे बड़ा सरदर्द उपेंद्र कुशवाहा को मान रहे हैं. कुशवाहा के लिए भी नीतीश ही समस्या हैं. इसलिए वह नीतीश पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ते.

हालांकि भाजपा इस चक्रव्यूह से उबर नहीं पा रही है. वह देश के अन्य राज्यों में NDA के बिखराव में बिखराव के कारण पहले से ही हतोत्साहित है. आंध्रप्रदेश में तेलगूदेशम पार्टी और महाराष्ट्र में शिव सेना के साथ उसके रिश्ते बदतरीन दौर में जा चुके हैं. ऐसे में बिहार से आरएलएसपी का अलग होने का जो मैसेज जायेगा वह भाजपा के लिए निगेटिव इम्पैक्ट डालेगा. लिहाजा उसकी कोशिश होगी कि वह जदयू और आरएलएसपी को बएक वक्त गठबंधन में बने रहने के लिए खुद नुकसान उठाये और अपनी सीटें और कम करे. क्योंकि इसका खामयाजा ना तो नीतीश उठाना चाहते हैं और न ही कुशवहा. कुशवहा के लिए एक आप्शन पहले से मौजूद है. वह आरजेडी से मधुर संबंध बनाये हुए हैं. नीतीश के लिए आरजेडी की तरफ मुड़ कर देखना भी अब मुश्किल है.

अगर कुशवाहा, आरजेडी के महागठबंधन का हिस्सा बनते हैं तो यह भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक झटका होगा. बिहार में कुशवाहा मतदाताओं की आबादी 5-6 प्रतिशत मानी जाती है. मुस्लिम, यादव के बाद कुशवहा ससबे आक्रामक वोटर माने जाते हैं. हालांकि यह दावा करना सही नहीं कि उपेंद्र कुशवाहा के शिफ्ट हो जाने से तमाम कुशवहा समाज महागठबंधन में शिफ्ट हो जायेगा. पर इतना तय है कि आज की तारीख में उपेंद्र कुशवहा, अपनी जाति के बिहार से सबसे कद्दावर नेता हैं. इसलिए उनका सिम्बालिक प्रभाव तो पड़ेगा ही. भाजपा के लिए यही बड़ी समस्या है. वह इस मनोवैज्ञानिक झटके को झेलने के लिए किन शर्तों पर तैयार होगी, यह देखा जाना बाकी है.

उधर भाजपा की एक और मजबूरी है. यह आंतिरक मजबूरी है. फिलवक्त उसके 22 सांसद हैं. दो सांसद- शत्रुघ्न सिन्हा व कीर्ति आजाद बागी हो चुके हैं. इन दोनों के लिए उशे कोई दिक्कत नहीं. लेकिन बाकी 20 सांसदों में से किसी का भी वह टिकट काटती है तो उसे डर है कि वे भी बागी हो जायेगा और वह भाजपा को हराने की कोशिश करेगा. ऐसे में भाजपा के लिए सीट शेयरिंग का मामला गले का फांस बनता जा रहा है.

 

 

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