मिश्र मर्डर: फैसला तो आ गया पर इन रहस्यों का जवाब कौन देगा?

ललितनारायणमिश्र हत्याकांड से संबंधित मुकदमे का फैसला जरूर  आ गया, पर हत्या से संबंधित कई रहस्य अनसुलझे ही रह गए विरष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशरो उन रहस्यों पर प्रकाश डाल रहे हैं.

ललित नारायण मिश्र

ललित नारायण मिश्र

 

अहम सवाल यह है कि इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य के ग्रेनेड हमले में घायल हो जाने के बाद भी उनके इलाज के मामले में घोर उपेक्षा क्यों की गई?
तत्कालीन रेल मंत्री मिश्र 2 जनवरी 1975 को बड़ी लाइन के उद्‌घाटन के सिलसिले में समस्तीपुर गए थे। रेलवे प्लेटफॉर्म पर आयोजित सभा में शाम करीब पौने छह बजे ग्रेनेड से उन पर हमला किया गया। मिश्र सहित कई लोग घायल हो गए। कई लोग तो मंत्री की अपेक्षा अधिक घायल थे। कुछ लोगों को इलाज के लिए दरभंगा पहुंचाया गया, पर ललित बाबू को दरभंगा के बदले दानापुर क्यों ले जाया गया?

दरभंगा पास है जबकि दानापुर 165 किलोमीटर दूर है।
जिस विशेष ट्रेन से ललित बाबू को दानापुर ले जाना था, वह दो घंटे देर से क्यों खुली? उस ट्रेन को चेन खींचकर पटना जंक्शन पर दो बार क्यों रोका गया? वह रात पौने 12 बजे दानापुर पहुंची। रेलवे अस्पताल में सुबह 5 बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। 3 जनवरी को साढ़े नौ बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके पुत्र ने बताया पिताजी की मौत ‘आॅपरेशन’ से हुई।

ग्रेनेड विस्फोट के तत्काल बाद राज्य मुख्यालय से हेलिकाॅप्टर भेजने का आग्रह किया गया था। वह क्यों नहीं आया? केंद्र सरकार ने अपने महत्वपूर्ण मंत्री की जान बचाने के लिए तब क्या किया?

चर्चिक कांग्रीस नेता पर आरोप

इस हत्याकांड की जांच की निष्पक्षता को लेकर भी कई सवाल उठे। पहले बिहार पुलिस की सीआईडी ने जांच शुरू की थी। दो व्यक्ति पकड़े गए। उन्होंने बयान दिया कि दिल्ली और पटना के कुछ चर्चित कांग्रेसी नेताओं के कहने पर उन्होंने ग्रेनेड विस्फोट किया था। पर इस रहस्योद्‌घाटन के तत्काल बाद ही जांच सीबीआई को क्यों सौंप दी गई?

सीबीआई ने जांच की दिशा क्यों बदल दी? दिशा बदलने पर मिश्र के परिजन ने एतराज किया। उन्होंने आरोप लगाया कि असली दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही है। उनके एतराज पर ध्यान नहीं दिया गया, जबकि मृतक के करीबी रिश्तेदार जिस एजेंसी से जांच कराने के लिए कहते हैं, उसी एजेंसी से जांच कराई जाती है।

 तारकुंडे रिपोर्ट

इस बीच, मार्च 1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। मई 1977 में ललित बाबू की पत्नी कामेश्वरी मिश्र ने तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह को लिखा कि इस हत्याकांड की जांच फिर से कराई जाए। बिहार की कर्पूरी ठाकुर सरकार ने मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीएम तारकुंडे से सीबीआई जांच की पड़ताल करने को कहा। तारकुंडे ने 1979 में कहा कि सीबीआई गलत ढंग से आनंदमार्गियों को फंसा रही है, पर तारकुंडे की रपट पर भी कुछ नहीं हुआ। इस पृष्ठभूमि में जब हत्याकांड के मुकदमें का गत 8 दिसंबर को फैसला आया तो ललित बाबू के पुत्र और बिहार विधान परिषद के सदस्य विजय कुमार मिश्र ने कहा कि चार निर्दोष लोगों को सजा दे दी गई।

अदर्स वॉयस कॉलम के तहत हम अन्य मीडिया की खबरें/लेख प्रकाशित करते हैं. यह लेख दैनिक भास्कर से साभार

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