“यहाँ टूटा हुआ पत्ता हवा के साथ चलता है/ कोई तन्हा नहीं होता खुद के साथ चलता है”

इक ज़रा सी सुख़न-फ़हमी अगर दे दे ख़ुदा,
ज़िन्दगी का लुत्फ़ ग़ालिब की तरफ़दारी में है!
 
तो ले चलते हैं आपको ज़िन्दगी का लुत्फ़ और ग़ालिब की तरफ़दारी के लिए लेख्य-मंजूषा की प्रस्तुति “बज़्म-ए-सुख़न” में, जिसकी सदारत मशहूर शायर जनाब क़ासिम ख़ुर्शीद साहब और निजामत जनाब अस्तित्व अंकुर कर रहे हैं ।
‘लेख्य-मंजूषा’ की सचिव श्रीमती वीणाश्री हेम्ब्रम के इन शब्दों से “बज़्म-ए-सुख़न” कार्यक्रम की शुरुआत हुई ।

ओसामा खान कविता पाठ करते हुए

ओसामा खान कविता पाठ करते हुए

मेहमान-ए-ख़ुसूसी (मुख्य अतिथि) थे जनाब अशोक कुमार सिन्हा साहब (अध्यक्ष, दी इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, इंडिया) और मेहमाने ख़ास जनाब संजय कुमार कुन्दन ।
 
रविवार को मौका था ‘लेख्य-मंजूषा’ द्वारा पटना के द इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स (इंडिया) के सभागार में आयोजित अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन/मुशायरे ‘बज़्म-ए-सुख़न’ का जिसमें कवियों और शायरों ने शानदार रचनाएँ सुनाईं।
“यहाँ टूटा हुआ पत्ता हवा के साथ चलता है
कोई तन्हा नहीं होता खुद के साथ चलता है”
मशहूर शायर डॉ. क़ासिम ख़ुरशीद की ग़ज़ल पर देर तक तालियाँ गूँजती रहीं।
प्रसिद्ध शायर संजय कुमार कुंदन ने शानदार ग़ज़लें और नज़्में सुनाईं
‘हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कराए हुए हैं’।
‘लेख्य-मंजूषा’ की सचिव वीणाश्री हेम्ब्रम ने अपनी संवेदनशील कविता “उलझे धागे”
‘सोने दो ना……
अभी सुबह कहाँ हुई है….
उठो भी, सूरज चढ़ आया है ………
के माध्यम से सम्पूर्ण जीवन के यथार्थ को धागों में पिरोया।
“रौशन सहर का भरम चाहिए
आप की एक नज़र-ए-करम चाहिए.”
शायर ओसामा खान ने ग़ज़ल और कविता (नज़्म) ‘वक़्त का अफसाना’ एवं ‘आज़ादी’ सुनाकर महफ़िल में खूब वाह वाही लूटी।
सिवान की डॉ नीलम श्रीवास्तव ने नारी-सशक्तिरण पर अपनी ग़ज़ल सुनाकर तालियाँ बटोरीं तो दूसरी तरफ ई. गणेश जी बाग़ी ने सवैया, घनाक्षरी एवं ग़ज़ल सुनाकर दर्शकों का दिल जीत लिया। उन्होंने वीर रस एवं हास्य रस में भी लोगों को सराबोर किया।
शायर समीर परिमल ने पिता पर रचना सुनाकर सबको भावुक कर दिया
‘मैंने आँगन में जो डाली कुर्सी, बन गई हाय सवाली कुर्सी/
वक़्त बेवक़्त बुलाती है मुझे, मेरे वालिद की वो खाली कुर्सी’।
डॉ. रामनाथ शोधार्थी, बांदा (उत्तर प्रदेश) से आए शायर कालीचरण सिंह जौहर, संजय कुमार, ज्योति गुप्ता और बैद्यनाथ सारथी ने अपनी अपनी ग़ज़ल और कविता सुना कर खूब समां बांधा।
शायरा आराधना प्रसाद ने अपनी मधुर आवाज़ में
‘बोल सूली पे तू चढ़ेगा क्या/बोलता सच है क्यूँ, मरेगा क्या’ सुनाकर खूब वाह वाही लूटी।
अस्तित्व अंकुर ने कहा- ‘तुम्हारा दर्द भी क्या-क्या कमाल करता है, रुलाके आँख में मोती बहाल करता है
अंत में सभी कवियों/शायरों को लेख्य-मंजूषा की ओर से प्रतीक चिह्न भेंट किए गए।
अध्यक्षीय भाषण में विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा कि ‘लेख्य-मंजूषा’ का उद्देश्य युवाओं में साहित्य को लोकप्रिय बनाना एवं उन्हें ‘सोच से सृजन’ की ओर प्रेरित करना है। धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती संगीता गोविल ने किया।

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