संवैधानिक नैतिकता का ख्‍याल रखें पीएम व सीएम

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्य न्यायाधीश समेत पांच सदस्यों की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिशानिर्देश के तौर पर कहा कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को चाहिए कि वे संवैधानिक नैतिकता का पालन करते हुए आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसदों-विधायकों को मंत्री बनाने से परहेज करें। सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी कि संविधान के संरक्षक के तौर पर प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे दागदार पृष्ठभूमि के व्यक्ति को मंत्री न बनाएं। हालांकि सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इस संबंध में कोई भी आदेश देने से इंकार कर दिया।suprim court
याचिकाकर्ता मनोज नरूला ने 2005 में एक जनहित याचिका दाखिल दाखिल की थी। अपनी याचिका में नरूला ने कैबिनेट से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को हटाने की मांग की थी। उससे पहले इसी मामले को लेकर नरूला की एक याचिका 2004 में खारिज कर दी गई थी। तब उन्होंने यूपीए सरकार से तत्कालीन मंत्रियों-लालू प्रसाद यादव, मोहम्मद तस्लीमुद्दीन, फातमी और जय प्रकाश यादव को हटाने की मांग की थी। याचिका खारिज होने के बाद नरूला ने पुनर्विचार याचिका दायर की, तब कोर्ट ने मामले को संवैधानिक बेंच के पास यह कहते हुए भेज दिया था कि इस मुद्दे पर संसद में बहस होनी चाहिए और अभी यह मामला दखल देने योग्य नहीं है।

मामले में केंद्र के वकीलों का तर्क है कि संसद के सदस्य एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से चुने गए हैं, इसलिए मंत्रियों को हटाने, संसद की संवैधानिक विशेषाधिकार और लोगों की इच्छा के खिलाफ है। केंद्र ने यह भी कहा है कि सांसद बनने वाला हर नेता कैबिनेट मंत्री बनने योग्य है, अगर प्रधानमंत्री चाहें। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील राकेश द्विवेदी का तर्क है कि ऐसे राजनेताओं को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जाना चाहिए, जिन पर कोर्ट में आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके हों।

 

बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि यदि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को कोर्ट किसी मामले में दोषी पाता है और उन्हें दो साल की सजा मिलती हैं, तो वे खुद-ब-खुद चुनाव लड़ने के लिए अपात्र घोषित हो जाएंगे। हालांकि, तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस मामले में संविधान संशोधन बिल लाने की कोशिश भी की थी, लेकिन नहीं ला पाई। सरकार तैयार थी, ड्राफ्ट भी बन चुका था, लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा सार्वजनिक रूप से ड्राफ्ट फाड़ने और राजनीतिक दलों द्वारा सहयोग न मिलने के चलते उसे कदम वापस लेने पड़े।राजद अध्यक्ष लालू यादव इस फैसले के सबसे पहले शिकार हुए थे।

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