सुनों मुसलमानो! सियासी आंसू बहाने के बजाये आगे बढ़ कर लीडरशिप क्यों नहीं थाम लेते?

मुसलमानों के दरम्यान यह मुद्दा गंभीर बहस का विषय बना रहता है कि सियासत में उनकी भूमिका पालकी ढोने वाले की क्यों है.

बिहार कोलेक्टिव की मीटिंग

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा होती है. आज भी हुई पर हर बार की तरह इस सवाल का कोई ठोस जवाब सामने नहीं आता. बिहार कोलेक्टिव(Bihar Collective) की पटना में आयोजित परिचर्चा में यह मुद्दा भी गंभीरता से उठा. लेकिन इस सवाल का कोई ठोस जवाब सामने न तो पहले आ पाया और न इस कार्यक्रम में ही आया. पर इतना तो तय है कि भारत के मुसलमान इस मुद्दे से लगातार जूझते रहे हैं.

मुसलमानों की चिंता इस बात को ले कर बराबर बनी रहती है कि लोकतंत्र में अगर सिर गिनने की बात है तो मुसलमान उन समुदायों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते जिनकी आबादी इन से काफी कम है. चूंकि यह चर्चा बिहार की राजधानी पटना में थी इसलिए इसमें बिहार को ही मिसाल के तौर पर पेश किया. बिहार में मुसलमानों की आधिकारिक आबादी 16.9 प्रतिशत है. यह आबादी दिगर पिछड़े वर्गों- यादव, कुर्मी और कोयरी से काफी ज्यादा है. जबकि इन तीनों समुदायों के नेता पिछले तीन दशक से बिहार की राजनीति को जड़ तक प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं. बिहार कोलेक्टिव के एक कर्णधार इकबाल अहमद ने इस मुद्दे की गंभीरता को उठाया और बताया कि 2014 तक मुसलमानों की सियासी हालत रेलवे कुली की रही, जो  लालू प्रसाद को,  मुलायम सिंह को और कभी मायवती व नीतीश कुमार को रेल पर बिठाते रहे. लेकिन कभी रेल की सवारी नहीं बने. 2014 के लोकसभा चुनाव में तो मुसलमानों की हालत रेलवे कुली जैसी भी नहीं रही.

भारतीय सियासत के कुली हैं मुसलमान

पहले कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों के वोट से सत्ता शिखर पर पहुंचती रही तो 1980 के दशक आते आते सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीतिक करने वाली पार्टियों ने यह जगह ले लिया. लेकिन मुसलमान वहीं के वहीं रह गये.

बिहार कोलेक्टिव(Bihar Collective) ने इस कार्यक्रम का आयोजन मुस्लिम मेकर्स ऑफ मॉडर्न बिहार ( Muslim makers of Modern Bihar)  के नाम से आयोजित किया. इसमें बिहार के चुनिंदा 65 सामाजिक-राजनीतिक हस्तियों के योगदान पर एक पुस्तक का विमोचन किया गया.

इस कार्यक्रम की खासियत यह रही कि इसमें मुसलमानों के विभिन्न सियासी आइडियालॉजी के लोग एक साथ मौजूद थे. हालांकि इस कार्यक्रम में अपनी बातें रखने के लिए महज चार लोग मौजूद थे. इनमें से एक कार्यक्रम के आयोजक इकबाल अहमद, दूसरे जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार, तीसरे पुस्तक के लेखक प्रो. सज्जाद और चौथे खुदा बख्श लाइब्रेरी के निदेशक रह चुके इम्तेयाज अहमद.

इस आयोजन  में वैसे तो अनेक मुद्दे उठाये गये लेकिन मुस्लिम लीडरशिप की समस्या, ऐसा विषय था जो कई बार अनेक रूपों में सामने आया. इस सवाल का जवाब हालांकि किसी ने खुल कर नहीं दिया लेकिन विवेक कुमार ने कांशी राम को याद करते हुए, बहुजन की उनकी फिलासोफी का जिक्र किया. जिसका सार यह है कि दलितों, पिछड़ों और अकलियतों की सामाजी व राजनीतिक समस्या एक जैसी है, लिहाजा इनके समाधान का फार्मुला भी वही है जो कांशी राम ने सुझाया. पर विवेक की कुमार ने कांशी राम के जिस फार्मुले की बात की उस फार्मुले में मुस्लिम लीडरशिप के समाधान की कत्तई कुंजाइश इन पंक्तियों के लेखक को कभी नहीं दिखती. बहुजनवाद की या सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेताओं की सैद्धांतिक राजनीति भले ही बहुजनों पर आधारित हो, पर तल्ख हकीकत यह है कि इसमें लीडरशिप के स्तर पर मुसलमान की कभी भूमिका नहीं दिखती. व्यावहारिक तौर पर बहुजनवाद या सामाजिक न्याय की राजनीति में मुसलमानों की भूमिका चंद सांसद, विधायक से आगे कभी नहीं गयी.

भीख की कुर्सियों से नहीं बदलता मुकद्दर

दर असल मुस्लिम राजनीति की समस्या यह है कि मुसलमान किसी राजनीतिक आंदोलन को लीड नहीं कर पाते. जो चंद लोग सियायसत में अपना मुकाम बना पाते हैं, वे भीख में मिली हुई कुर्सियों को ही अपनी खुशनसीबी समझ कर खुश हो लेते हैं.

किसी आंदोलन या किसी सामाजिक मुद्दे को लीड करने का जोखिम एक तो मुस्लिम कम्युनिटी की तरफ से शुरू नहीं होती. या फिर अगर कुछ छोटी कोशिशें की जाती हैं तो उसे मुसलमानों का ही समर्थन नहीं मिलता. अधिकतर मुसलमान यह कहके इस प्रयास को नकार देते हैं कि मुस्लिमों की गोलबंदी से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होगा. पर यह समाधान की तरफ बढने के बजााय समस्या से भागने का बहाना है.

लोकतंत्र में सारी ताकतें आपके जनाधार पर निर्भर करती हैं. एक एक समाज का नेता अपने समाज के वोटरों पर प्रभावशाली पकड़ बना ले तो दूसरे समुदायों के लोग खुद ही चल कर उसके पास जायेंगे और उसके साथ अलायांस करेंगे. राजनीति का यह फार्मुला अगर विशुद्ध रूप से सेक्युलर मूल्यों पर आधारित होगी तो हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की संभवानायें बिल्कुल भी नहीं होंगी.

पर सवाल यह है कि ऐसी सियासत के लिए बड़े साहस और समर्पण की जरूरत है. इस पर अमल करेगा कौन? यह सवाल सबसे बड़ा है.

 

 

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