91 साल का हुआ भारत का सबसे पुराना तिब्बी कॉलेज: जानिये कुछ यादें, कुछ बातें

कदम कुआं, बुद्ध मुर्ती पटना के नज़दीक से गुज़रते हुए कभी आपने ग़ौर किया कि यहां पर भारत का सबसे पहला सरकारी युनानी मेडिकल कालेज है, जिसे दुनिया आज राजकीय तिब्बी कालेज कदम कुआं पटना के नाम से जानती है.

उमर अशरफ, नौकरशाही डॉट कॉम

राजकीय तिब्बी कॉलेज पटना

अब जब राजकीय तिब्बी कॉलेज एंड हॉस्पिटल 29 जुलाई 2017 को अपना 91वां स्थापना दिवस मना रहा है. क्या प्रिंसपल, क्या प्रोफ़ेसर, क्या स्टुडेंट , सब इस दिन को यादगार बनाने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं, स्थापना दिवस की तैयारियां कॉलेज में प्रधानाचार्य डॉ. मुहम्मद ज़्याउद्दीन की अध्यक्षता में हो रही है। स्थापना दिवस की तैयारियों की ज़िम्मेदारी डॉ. तौहीद और डॉ. तनवीर आलम को दी गई। स्थापना दिवस को भव्य, सुंदर और आकर्षक बनाने की तैयारियों में सब लगे हैं, तो एक ज़िम्मेदार शहरी होने के नाते मेरा भी कुछ फ़र्ज़ बनता है, तो चलिए मै आपको युनानी चिकित्सा पद्धती के फ़रोग़ में इस इदारे द्वारा किये गए काम और योगदान के बारे में कुछ बता दूं.

 

क्या है योगदान

91 साल से अपनी सेवा दे रहा ये इदारा पिछले 83 साल से कदम कुआं, बुद्ध मुर्ती पटना के पास है, हर साल यहां 40 छात्रों का नामांकन BCEC द्वारा होता है। आज यहां 40 छात्रों का कई बैच चल रहा है, जिसमे तक़रीबन 200 छात्र हिकमत की पढ़ाई कर रहे हैं, और हर साल यहां से 40 छात्रों का बैच फ़ारिग़ हो कर निकलता है।

 

कॉलेज के ही कैंपस मे हॉस्टल है जिसमे तक़रीबन 40 छात्र रह कर पढ़ाई कर रहे हैं, अगर लिंग अनुपात की बात करें तो 30% छात्राएं यहां तालीम हासिल कर रही हैं. 14 डिपार्टमेंट में बटे राजकीय तिब्बी कॉलेज में 45 प्रोफ़ेसर की एक  टीम है. सरकार ने मॉडल कालेज और CCIM के लिए कुछ पोस्ट सैंकशन किया है जिससे जल्द ही इसमें 40 प्रोफ़ेसर और जुड़ने वाले हैं, जो छात्रों को पढ़ाएंगे.

दो सौ बेड का अस्पताल 

 

तिब्बी कॉलेज के कैंपस में ही एक छोटा हर्बल गार्डेन है और इस कॉलेज का एक बहुत बड़ा हर्बल गार्डेन IGIMS पटना के कैंपस में मौजुद है. राजकीय तिब्बी हॉस्पिटल के हॉस्पिटल सुप्रीडेंडेंट हैं अमीरउद्दीन अंसारी साहेब, जिनकी क़यादत में हॉस्पिटल चल रहा है, अभी हॉस्पिटल में 75 बेड है, जिसे बढ़ा कर 200 करने का सेंकशन पास हो चुका है.

तिब्बी हॉस्पिटल का अपना न्युरो रिहैबिलेशन वार्ड है, जहां जटिल से जटिल जोड़ के दर्द, लकवा का ईलाज होता है,  भारत से बड़ी तादाद में मरीज़ थक जब थक हार जाता है तो यहां आता है और अच्छा हो कर जाता है, सफ़ेद दाग़, सुनबहरी समेत तमाम चर्म रोग का बेहतरीन इलाज यहां होता है, इसके साथ मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, गठिया और माइग्रेन का इलाज होता है, इन सब के इलावा डिप्टीशन पर 10 डॉक्टरों की एक टीम PMCH और NMCH से यहां आती है, जो अनेथेसिया, सर्जरी, डेंटल, टी.एन.टी, पैथेलॉजी, पिडीया वैग़ारा देखते हैं.

 

पिछले साल हॉस्पिटल स्टाफ़, पारा मेडिक और टेकनिशयन की 160 सीट का सेंकशन सरकार ने पास किया था, जिस पर अभी तक अमल  नहीं हुआ है, जससे मरीज़ों को काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

ये है  इतिहास

अगर इस कॉलेज के इतिहास की बात करें तो हमें मार्च 1915 में जाना होगा जब दरभंगा महराज की अध्यक्षता में एक जलसा ऑल इंडिया आयुर्वेदिक एंड यूनानी तिब्ब कांफ्रेंस के नाम पर होता है, जिसमें मौलाना आज़ाद, सर फ़ख़रूद्दीन, हकीम अजमल ख़ान, सर गणेश दत्त, सर अली ईमाम, मौलाना मज़हरुल हक़, हकीम इदरीस, हकीम रशीदुन्नबी, हकीम क़ुतुबउद्दीन, हकीम अब्दुल क़य्युम, पटना के विधायक मुबारक करीम, अहमद शरीफ़ (बार एैट लॉ) जैसे क़द्दावर लोग शरीक होते हैं और बिहार सरकार से आयुर्वेदिक और यूनानी स्कुल खोलने की मांग करते हैं. फिर इसके बाद शुरु होता है सरकारी मेडिकल कॉलेज के लिए जद्दोजहद. मौलाना मज़हरुल हक़ जो उस समय पटना के बड़े वकील थे, ने इस तहरीक में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और आर्थिक मदद की . सर फ़ख़रूद्दीन और सर गणेश दत्त उस समय की सरकार में मंत्री थे, उन्होंने इस तहरीक का समर्थन किया. 10 साल की जद्दोजहद के बाद कामयाबी हाथ लगी और 1924 में कमिश्नर इस चीज़ पर राज़ी हो गया कि बिहार में ना सिर्फ़ मेडिकल स्कूल खुलेगा बल्कि उसके साथ ही साथ अलग-अलग आयुर्वेदिक और यूनानी स्कूल भी खोले जाएंगे.

 

इसी के साथ अगले साल फ़रवरी 1925 में बिहार का पहला मेडिकल कॉलेज प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज वजुद में आया, जिसे आज दुनिया PMCH के नाम से जानती है. इसके बाद 26 जुलाई 1926 को बिहार का पहला सरकारी आयुर्वेदिक स्कुल वजुद में आया और 29 जुलाई 1926 को ना सिर्फ़ बिहार का बल्की पुरे बर्रे सग़ीर का पहला सरकारी तिब्बी स्कुल पटना में वजुद में आया. तिब्बी कालेज प्रिंसपल जनाब “प्रोफ़ेसर मुहम्मद ज़ियाउद्दीन” साहेब बताते हैं के पटना ज़िला के डाक पालीगंज के ग़ौसगंज गांव के रहने वाले अहमद रज़ा क़ुरैशी साहब पहले छात्र हैं जिन्होने इस स्कुल(तिब्बी कालेज) में दाख़िला लिया, जिन्होने साले अव्वल में उर्दु और फ़ारसी ज़ुबान में पढ़ाई शुरु की.

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