नीतीशजी मुस्लिमों पर औरंगाबाद पुलिस जुल्म से मुंह मत फेरिये, UP की तरह बिहार बदनाम हो रहा है

नीतीशजी मुस्लिमों पर औरंगाबाद पुलिस जुल्म से मुंह मत फेरिये, UP की तरह बिहार की जगहंसाई हो रही है

नीतीशजी मुस्लिमों पर औरंगाबाद पुलिस के जुल्म से मुंह मत फेरिये, UP की तरह बिहार बदनाम हो रहा है

अब तक तो यूपी में योगी सरकार की पुलि की गुंडागर्दी के किस्से और वॉयरल विडियो से देश स्तब्ध था लेकिन बिहार में नीतीश की पुलिस की बर्बरता का भयावह रूप भी सामने आ गया है. इर्शादुल हक व फैसल सुलतान की रिपोर्ट

नागरिकता कानून के विरोध में परदर्शन के बाद बिहार की औरंगाबाद पुलिस ने एक परिवार के घर में घुस कर जो जुल्म की सीमायें लांघी उससे साफ पता चलता है कि योगी आदित्यनाथ सरकार की पुलिस के रास्ते पर नीतीश कुमार की पुलिस चल रही है.

पुलिस के अत्याचार की इस कहानी से नीतीश कुमार के सामाजिक समरसता के दावे की पोल खुल गयी है.

अंग्रेजी वेबसाइट फर्सट पोस्ट की रिपोर्ट एक मुस्लिम परिवार के ऊपर पुलिस के जुल्म की बानगी बयां करती है.

वेबसाइट ने लिखा है कि औरंगाबाद के कुछ मुस्लिम परिवार पुलिस जुल्म से इतने सहमे हैं कि वे अपने दर्द की कहानी तो बता रहे हैं पर पुलिस के खौफ के कारण नाम नहीं उजागर कर रहे हैं. वेबसाइट ने  लिखा है कि पुलिस ने न सिर्फ महिलाओं और बूढ़ों पर, घर में घुस कर जुल्म ढाया बल्कि 12-15 साल के बच्चों के ऊपर एफआईआर दर्ज करके उनकी उम्र 18 साल से ज्यादा लिखी.

पुलिस जुल्म की हद

खुर्शीदा खातून का कहना है कि  21 दिसंबर, 2019 को उसके घर में घुसने के बाद, “उन्होंने हमें धमकी दी कि अगर हमने दरवाजा नहीं खोला तो वह गोली मार देगा।” “घर में केवल महिलाएँ थीं, और मेरे चाचा जो बहुत बूढ़े हैं, उन्हें भी नहीं बख्शा। पुलिस के साथ एक महिला कांस्टेबल भी नहीं थी। ”

खातून के भाई दुकान पर थे, और उसके पिता सऊदी में रहते हैं, घर में सिर्फ महिलाए थीं । “लेकिन पुलिस को कोई फर्क नहीं पड़ा,” उसने कहा। “पुलिस ने अलमारी खोली, घर में तोड़फोड़ की, दरवाजा तोड़ा और मेरी स्कूटी को फेंक दिया, जैसे कि हम अपराधी हों। उन्होंने हमारे द्वारा दोहराए जाने वाले शब्दों का ऐठ कर और गाली बक कर हमें एब्यूज किया । हमें बहुत असुरक्षित महसूस हुआ। मैंने इलाके में बंदूक की गोली की आवाज भी सुनी।

इससे एक दिन पहले, औरंगाबाद शहर के रमेश चौक पर राजद के आह्वान पर एक विरोध प्रदर्शन किया था. राजद और उसके सहयोगियों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) के खिलाफ रैली करने के लिए बंद का आह्वान किया था। लेकिन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को पुलिस द्वारा हिंसक बताया गया। अशांति के बाद, निवासियों ने बताया, पुलिस ने “उपद्रवियों” की पहचान करने के लिए विरोध स्थल के आसपास मुख्य रूप से मुस्लिम इलाकों में छापेमारी शुरू कर दी।

नौकरशाही डॉट कॉम को एसपी ने क्या जवाब दिया

इस मामले में नौकरशाही डॉट कॉम के एडिटर इर्शादुल हक ने जिले के एसपी दीपक बरनवाल को 29 दिसम्बर को फोन किया तो उनका जवाब था- “इस मामले को देख लेता हूं”. जब उनसे पूछा गया कि इस घटना के 7 दिन बीत गये आपने अभी तक देखा नहीं?ते दीपक बरनवाल ने टालने के अंदाज में बात की कि “मैं इसे अभी देख के क्लियर करता हूं”.

पुलिस के इस टालू रवैये से समझा जा सकता है कि पुलिस के अधिकारी इस मामले में कितने गंभीर हैं और जवाब देने से भाग रहे हैं.

सवाल यह है कि क्या इन बातों की खबर राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नहीं है?

पुलिस का बच्चों पर जुल्म और झूठे तर्क

मीडिया में यह खबर उजागर हो चुकी है कि प्रदर्शन के बाद अनेक अव्यस्क लोगों की उम्र व्यस्क बना कर केस दर्ज किया गया है. एक लड़के की मैट्रिक सर्टिफिकेट के अनुसार फरवरी 2020 में 17 वर्ष होने वाली है लेकिन एफआईआर में उसकी उम्र 22 वर्ष लिखी गयी है.

इसी तरह फर्स्ट पोस्ट ने कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से लिखा है कि राजद के नेता और वार्ड पार्षद सिकंदर हयात को पुलिस ने टारगेट किया और उन पर भीड़ को उकसाने, दुकानदारों को पीटने का आरोप लगाया गया है जबिक सच्चाई यह थी कि सिकंदर हयात लोगों को नियंत्रित करते देखे गये.

Also Read

सरकार के गले की फांस बन गया है NPR, अखिलेश ने सैकड़ों समर्थकों के साथ फार्म न भरने की ली प्रतिज्ञा

यह याद रखे की बात है कि औरंगाबाद पिछले कुछ दिनों से साम्प्रदायिक रूप से काफी संवेदनशी क्षेत्र के रूप में सामने आया है. पिछले ही साल रामनवमी के अवसर पर हिंसक भीड़ ने कब्रिस्तान पर भगवा झंडा गाड़ा दिया था और उस दौरान आगजनी की गयी थी. इस मामले में पुलिस की भूमिका काफी संदिग्ध रही थी.

इस बार बंद के दौरान भी मामले को साम्प्रदायिक बनाने की कोशिश की गयी है.

फर्सट पोस्ट ने अपनी खबर में एक छात्र के हवाले से लिखा है कि औरंगाबाद में नागरिकता कानून के खिलाफ बंद के दौरान साम्प्रदायिक उन्माद की कोशिश की गयी लेकिन जब पुलिस कार्रवाई की बारी आयी तो पुलिस ने मुस्लिमों के घरों और मुस्लिम युवाओं को ही निशाना बनाया.

इन घटनाओं को हुए करीब एक हफ्ता बीत चुका है. दर्जनों लोग हिरासत में हैं. मामले ने पूरे बिहार को सत्बध कर दिया है लेकिन जिले के एसपी  जब यह कहें कि वह इस मामले के बारे में पता करते हैं तो समझा जा सकता है कि पुलिस किस मानसिकता से काम कर रही है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*