हक की लड़ाई का इंकलाबी बिगुल साबित हो सकती है ‘दीन बचाओ देश बचाओ’ रैली

यह हक की लड़ाई का इंकलाबी बिगुल है.मुसलमानों के चार सौ से ज्यादा मजहबी व सामाजिक संगठन इस अभियान का हिस्सा बन चुके हैं.  गांव-मुहल्ले  में आम बहस का मुद्दा बन चुकी ‘दीन बचाओ,देश बचाओ रैली’ 15 अप्रैल को पटना के गांधी मैदान में एक नयी नजीर बनने को अग्रसर है.

 

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इर्शादुलह हक, एडिटर नौकरशाही डॉटकॉम, फॉर्मर फेलो इंटरनेशनल फोर्ड फाउंडेशन

इस रैली के लिए इमारत शरिया के दर्जनों संगठनों ने राज्य व देश के सैकड़ों संगठनों के साथ मिल कर जैसा होमवर्क किया है उससे यह साफ हो चुका है कि गांधी मैदान लोगों की उमड़ती भीड़ के सामने छोटा पड़ जायेगा. इस रैली का मकसद दीन बचाओ, देश बचाओ है.

 

ऐसे समय में जब संविधान पर खतरों के बादल मंडरा रहे हों. दलितों के संवैधानिक अधिकार किसी न किसी बहाने छीने जा रहे हों और ऐसे हालात में जब मुसलमानों के मजहबी कानून में संस्थानिक तरीके से छेड़-छाड़ की जा रही हो,  बिहार के मुस्लिम संगठनों ने इस रैली के आयोजन का फैसला किया है.

 

इस रैली में इमारत ए शरिया के अमीर ए शरीयत मौलाना वली रहमानी व जनरल सेक्रेटरी मौलान अनीसुर रहमान कासमी पिछले दो महीने से मेहनत कर रहे हैं. उनके प्रयासों का नतीजा है कि आज इस रैली में इदारा शरीया, जमायत ए इस्लामी, जमीतुल उलेमा ए हिंद, राज्य की तमाम खानकाहें, सैकड़ों निजी मदरसे व शैक्षिक संस्थान, छोटे बड़े दर्जनों सामाजिक संगठन  एकजुट हो कर इस रैली की तैयारियों में जुटे  हैं.

साथ ही दलितों से जुड़े दर्जनों संगठनों ने भी इस रैली की सफलता के लिए जी जान लगा चुके हैं.

इस रैली की तैयारियों से जुडी विभिन्न कमेटियों द्वारा अब तक की प्रगति के लिए अलग-अलग बैठकों से पहले इमारत शरिया के नाजिम मौलाना अनीसुर्ररहमान कासमी के नेतृत्व में एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया. मौलाना कासमी ने इस अवसर पर खास करके इस बात के लिए संतोष जताया कि मुसलमानों के विभिन्न मतों से जुड़ी तंजीमों ने जिस दिल खोल कर और साथ मिल कर तैयारी की है यह अपने आप में हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने कहा कि पंद्रह अप्रैल को गांधी मैदान में आयोजित होने वाली यह यह रैली साबित कर देगी की इस देश के नागरिकों में अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति कितनी बेचैनी है.

 

दर असल ‘दीन बचाओ देश बचाओ रैली’ ट्रिपल तलाक के इस्लामी उसूलों पर सरकार द्वारा संस्थानिक तौर पर हस्तक्षेप की कोशिशों के खिलाफ  मुसलमानों के विरोध का प्रकटीकरण है. इस रैली की तैयारी और इसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि इस रैली में किसी राजनीतिक दल या उसकी सर्वोच्च लीडरशिप का कोई दखल ना हो.

 

मौलाना कासमी नौकरशाही डॉट कॉम से कहते हैं- हमने किसी सियासी पार्टी के सर्वोच्च लीडरशिप को दावत नहीं दी है. हम अपने हक की लड़ाई अपने बूते पर और जनता की ताकत पर लड़ना चाहते हैं. वह कहते हैं इस रैली में मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स, सोशल लीडर्स या पालिटिक्स से जुड़े लोग जिनके दिल में मुसलमानों के अधिकारों के लिए जज्बा है वह खुद भी इस रैली की कामयाबी की कोशिशों में जुटे हैं.

रैली क्यों 

(अबू दोजाना भी इस रैली की सफलता के लिए मेहनत कर रहे हैं)

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पिछले दिनों तीन तलाक के मुद्दे पर एक बिल लोकसभा में पेश किया था जिसे पास कर दिया गया है. इस बिल के अनुसार तीन तलाक देने को कानूनी तौर पर अपराध घोषित करने का प्रावधान है. यह बिल अभी राज्यसभा से पास होना है. लेकिन इस बिल में तीन तलाक को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की गयी. मौलाना कासमी कहते हैं कि इस बिल के कानून बन जाने के बाद जेन्यून कारणों से दिये गये तलाक को भी कानूनी पचड़ों में फंसा कर अपराध घोषित किया जा सकता है, जबकि 95 फीसद से ज्यादा मामलों में तलाक , तब होता है जब पति-पत्नी के साथ रहने की सारी संभावनाये खत्म हो जाती हैं.

दीन बचाओ देश बचाओ रैली के अनेक उद्देश्यों में से एक उद्देश्य यह भी है कि सरकार पर जोर डाला जा सके कि वह मुसलमानों के मजहबी कानून को सरकारी डंडे से हांकने की कोशिश ना करे.

 

केंद्र पर निशाना

इस विषय पर राष्ट्रीय जनता दल के सुरसंड से विधायक अबू दोजाना कहते हैं कि केंद्र सरकार और खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम ‘बहनों’ के अधिकार को कथित तौर पर सुरक्षित करने के लिए घरियाली आंसू बहाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. और तो और मीडिया का बड़ा हिस्सा भी उनकी ही भाषा बोल कर लोगों को गुमराह करने में लगा है. हम इस रैली के जरिये उनकी साजिशों को बेनकाब करने का बीड़ा उठा चुके हैं.

इस बड़े आयोजन में स्वाभाविक तौर पर जुटने वाली भारी भीड़ को डिसिप्लिन्ड रखने की भी पूरी तैयारी की जा चुकी है. इमारत शरिया के अधिकारियों ने बाजाब्ता इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिल कर आग्रह किया है कि इस आयोजन के दौरान कानून व्यवस्था सुनिश्चित की जाये. सूचना है कि सरकार ने भी प्रशासन को चुस्त दुरुस्त कर रखा है.

इस रैली की तैयारियों से जुड़े जानकारों का भरोसा है कि इस आयोजन में कम से कम पांच लाख लोगों का जुटान होगा.

लीडरशिप का शक्ति प्रदर्शन

इस रैली के माध्यम से भले ही दीन( मजबह) व देश बचाने का उद्घोष होगा लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके सामाजिक व राजनीतिक परिणाम भी सामने आयेंगे.  बिहार में मुसलमानों के वोट की ताकत का अंदाजा तो वैसे तमाम राजनीतिक पार्टियों को है, पर यह भी तय है कि यह रैली मुस्लिम लीडरशिप की ताकत के प्रदर्शन की नजीर भी पेश करेगी. जिसका असर निश्चित तौर पर आने वाले चुनावों में दिखेगा.

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