मुसलमानों के बहाने मूलनिवासी बहुजनों को गुलाम बनाने का षड्यंत्र है NRC

मुसलमानों के बहाने मूलनिवासी बहुजनों को गुलाम बनाने का षड्यंत्र है NRC

नौकरशाही डॉट कॉम के एडिटर Irshadul Haque ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर साबित कर रहे हैं कि मुसलमानों के बहाने मूलनिवासी बहुजनों को ब्रह्मणवाद की गुलामी में वापस ले जाने का कैसे षड्यंत्र रचा गया है.

Irshadul Haque, Editor Naukarshahi.com

  • मुसलमान की नागरकता खत्म हुई तो होगा क्षेत्रीय दलों का सफाया 
  • सामाजिक न्याय व बहुजन आंदोलन का कवच हैं मुसलमान, कवच ध्वस्त हुआ तो मिट जायेंगे ये आंदोलन
  • मिट जायेंगे क्षेत्रीय दल

CAA और NRC का गठजोड़ भारत को अंधकार युग की तरफ ले जाने का षड्यंत्र है. ब जाहिर इसके निशाने पर मुसलमानों को रखा गया है लेकिन इससे उपजी संभावित तबाही के केंद्र बिंदु में भारत के ओबीसी, एससी और एसटी समाज है.ये बातें जो मैं ने कही हैं वह कोरी कल्पना पर आधारित आशंका नहीं बल्कि इतिहास के अनुभवों पर आधारित है. इतिहास के पन्न इस बात के गवाह हैं कि पुष्य मित्र शुंग, मौर्य वंश के अंतिम शसासक वृहद्रथ की धोखे से हत्या करके खुद को राजा घोषित करने के बाद सबसे बड़ा आक्रमण बौद्ध धर्मावलम्बियों पर किया था. वृहदरथ के यहां सेनापति के किरदार में काम करने वाले पुष्यमित्र शुंग ने यहां तक घोषणा की थी कि जो कोई भी एक बौद्ध धर्मावलम्बी का सर ला कर देगा उसे सोने सौ सिक्के इनाम के रूप में दिये जायेंगे. अपने इस मिशन में पुष्यमित्र शुंग काफी हद तक कामयाब रहा था. अपनी ही धरती पर बौद्ध धर्म को विलुप्ति के कगार पर पहुंचाने का सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि भारत के मुलनिवासी ( आजके एससी,एसटी,ओबीसी) समाज को ब्रहम्णवादी व्यवस्था का फिर से गुलाम बनना पड़ा.

बौद्धीज्म की तरह इस्लाम पर निशाना

CCA और NRC के पर्दे के भीतर का खेल पुष्यमित्र शुंग की प्रेरणा से ओतप्रोत लगता है. इस खेल के असल निशाने पर भारत के एससी, एसटी और ओबीसी समाज हैं. पिछले सत्तर सालों में इस बहुजन मूलनिवासियों ने आजाद भारत में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के बूते सामाजिक व राजनीतिक रुत्बा हासिल की. ब्रह्णवादी निजाम इसे कत्तई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उनका वर्चस्व समय के साथ बढ़ता जाये. लेकिन जब तक भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है तब तक ब्रह्मणवादी शक्तियों के लिए यह संभव नहीं कि वे मूलनिवासी बहुजनों को चुनौती दे सके. लिहाजा उसने CCA और NRC का सुविचारित फार्मुला गढ़ा. यह फार्मुला ऊपरी तौर पर कहीं से भी एससी, एसटी और ओबीसी को प्रत्यक्ष रूप से निशने पर नहीं लेता. बल्कि उसने इसके निशाने पर बजाहिर मुसलमानों को रखा है. ताकि ओबीसी, एससी और एसटी समाज के एक हिस्से को अंधकार में रख कर इस हथकंडे को कामयाब बनाने में उनकी सहायता ली जा सके.

 

CCA और NRC के पीछे का षड्यंत्र

आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों को पता है कि मुसलमानों का व्यापक समर्थन क्षेत्रीय, समाजवादी, सामाजिक न्याय व बहुजन राजनीति करने वाले दलों को मिलता है. नये नागरिकता कानून के आ जाने के बाद जब केंद्र सरकार एनआरसी यानी नेशनल सिटिजनशिप रजिस्टर लागू करेगी तो न सिर्फ मुसलमान बल्कि हिंदुओ के आधे से अधिक आबादी के लोग अपनी भूमि से जुड़ी दस्तावेज, बाप दादों के सरकारी प्रमाण पत्र, 70 साल पुरानी सरकारी दस्तावेज या अन्य कोई प्रमाण नहीं पेश कर सकेंगे. ऐसे में नया नागरिकता कानून हिंदू, बौद्ध, ईसाई, जैन,सिख और पारसी के बचाव के लिए कवच के रूप में मौजूद रहेगा. चूंकि नया नागरिकता ऐक्ट इस बात की गांरटी देता है कि 31 दिसम्बर 2014 तक उक्त छह धर्मों के लोग अगर भारतीय नागरिक नहीं हैं तो उन्हें नागरिकता प्रदान कर दी जायेगी. इस सिलसिले में असम के एनआरसी को देखें. जिन 14 लाख हिंदुओं के नाम एनआरसी में नहीं आ सकें हैं, नये कानून के लागू होते ही उन्हें नागरिकता मिल जायेगी. बच जायेंगे मुसलमान.

 

OBC, SC, ST फिर बन जायेंगे गुलाम

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होगी. जैसे ही मुसलमानों की बड़ी आबादी ( जिसका वास्तविक अनुमान संभव नहीं) नागरिकता से वंचित होगी, उसका सबसे व्यापक कुप्रभाव क्षेत्रीय दलों ( जो बहुजन मूलनिवासी, सामाजिक न्याय की राजनीति करती हैं) पर पड़ेगा. इन दलों का जनाधार रेत के पहाड़ की तरह भरभरा के गिरेगा. और ये दल मुसलमानों की नागरिकता खत्म होते ही इतिहास के पन्नों में विलीन हो जायेंगे, मिट जायेंगे. क्योंकि नागरिकता खत्म होने के बाद मुसलमान डी-वोटर्स यानी संदिग्ध मतदाता बन जायेगा जो बिलआखिर वोट के अधिकार से वंचित हो जायेगा.

NRC से मिट जायेंगे क्षेत्रीय दल

वोट के अधिकार से मुस्लिमों को वंचित करने के पीछे जो गुप्त षडयंत्र प्रतीत होता है वह है-अनुसूचित जाति, पिछड़ी जातियां और आदिवासी वर्चस्व वाली पार्टियों का विनाश करना. मुसलमान क्षेत्रीय दलों के लौह कवच हैं. एनआरसी और सीएए उसी कवच को भेदने का फार्मुला है. जब क्षेत्रीय दलों के शरीर का कवच ही ध्वस्त हो जायेगा तो फिर कालांतर में क्षेत्रीय दलों को बच पाना असंभव होगा. ऐसे में जब लोकतांत्रिक रूप से इन पार्टियों का सफाया हो जायेगा तो ब्रह्मणवादी निजाम पूरी भारत भूमि पर स्थापित हो जायेगा. स्वाभाविक तौर पर एससी, एसटी, ओबीसी समाज तब फिर उसी तरह वर्णव्यवस्था के शिकंजे की गिरफ्त में आयेंगे जैसे पहले थे.

ऊपर हमने पुष्यमित्र शुंग के इतिहास का उल्लेख किया है. पुष्यमित्र शुंग के उसी इतिहास को दोहराने का षड्यंत्र है CCA और NRC. बस बौद्ध की जगह इस्लाम या मुसलमान होगा.

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