पत्रकारिता के ‘अमीन सयानी’ कमाल खान को आखिरी सलाम

पत्रकारिता के ‘अमीन सयानी’ कमाल खान को आखिरी सलाम

पत्रकारिता के ‘अमीन सयानी’ कमाल खान को आखिरी सलाम
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Irshadul Haque

कमाल खान ( Kamal Khan NDTV) ने जब पत्रकारिता शुरू की थी तब उत्तर प्रदेश विध्वंसक राजनीति का कुरूप चेहरा लिया खड़ा था. फिर भी इस दौर में कमाल ने शालीनता और शऊर की पत्रकारिता से अमिट छाप छोड़ी है.

14 जनवरी को जब एक तरफ लोग कोरोना से बचते हुए मकर संक्रांति मनाने की तैयारी कर रहे थे तो दूसरी तरफ जुमे की तैयारी भी चल रही थी. ऐसे में कमाल खान की अचानक मौत की खबर आते ही न सिर्फ पत्रकारिता की दुनिया में मातम छा गया, बल्कि राजनीति की दिग्गज हस्तियां भी उनके बिछड़ने के शोक में डूब गये.

टीवी पत्रकारिता, एक तरफ भाषा और शब्दों के समुचित प्रयोग से तथ्यों की सुलझी तस्वीर उतारने का फन है तो दूसरी तरफ आवाज की मोहकता भी उसे और सशक्त बनाती है. कमाल खान इन तमाम फन के महारि थे. टिप्पणीकार प्रियदर्शन तो उनकी कापियों से गुजरने को पत्रकारिता के प्रशिक्षण से गुजरना बताते हैं.

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आवाज की दुनिया में एक समय अमीन सयानी की जो शहोरत थी वही मुकाम आज कमाल खान ने पत्रकारिता में हासिल कर ली थी. गीत माला कार्यक्रम में सयानी गीतों की पत्रकारिता ही तो करते रहे. और गीतों की मिठास को उन्होंने अपने शब्दों और शब्दों की अदायगी से मकबूल किया. ठीक वही काम कमाल खान ने पत्रकारिता में कर दिखाया.

संतोष की बात है कि 89 साल की उम्र में भी अमीन सयानी आज भी हमारे बीच हैं लेकिन कमाल खान महज 61 साल में चल बसे.

शब्दों के उच्चारण से ले कर शालीन और शऊर भरे शब्दों के प्रयोग में कमाल खान कमाल के थे. बहुत से लोगों को अमीन सयानी का दौर अब भी याद होगा जब रेडियो पर बिनाका नामक कार्यक्रम सुनने के लिए लोग हर हफ्ते इंताजर करते थे. ठीक उसी तरह कमाल खान की रिपोर्ट जब एनडीटीवी पर आती थी तो लोग चैनल बदलने की इच्छा त्याग देते थे.

कमाल खान ने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो लखनऊ की तहजीब किताबों का हिस्सा बन चुकी थी. भाषा में अदब और एहतराम को हिंसक और साम्प्रदायिक राजनीति ने मिटा सा दिया था. वैसे दौर में कमाल खान का, कमाल खान होना भी एक अपराध जैसा हो चुका था. अपराध बोध के उस दौर में कमाल खान ने हवा के रुख की परवाह किये बगैर जिस मिठास भरे शब्दों से कठिन और चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता का मोर्चा संभाले रखा वह अपने आप में अजीम मिसाल है.

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ऐसे दौर में जब पत्रकारिता एक एजेंडे को आगे बढ़ाने और एक खास विचारधारा की राजनीति को मजबूत करने तक सिमट गयी है, तब कमाल खान की पत्रकारिता अंधेरे में टिमटिमाते चिराग की नीली रौशनी की तरह चमकती रही. न सिर्फ चमकती रही बल्कि खबर को पूरी निष्पक्षता से जानने की लालसा रखने वाले करोडों लोगों को उनकी पत्रकारिता रहनुमाई करती रही.

नयी पीढ़ी के पत्रकारों में सीखने और पत्रकारिता के मयार को जानने-समझने के लिए कमाल खान एक मिसाल बने रहेंगे.

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