Pappu Yadv की सियासत की समस्या क्या है?

Pappu yadav 30 साल के राजनीतिक सफर में भी एक गंभीर नेता नहीं बन पाये

By Irshadul Haque, Editor naukarshahi.com

पप्पू यादव एक जुझारू (Pappu Yadav) नेता हैं. वह जमीन पर उतर के राजनीति करते हैं. आम लोगों की समस्याओं से जुड़ जाते हैं. उन समस्याओं का निदान खोजते हैं. वह उनसे भाउकता के साथ लगाव बना लेते हैं. पिछले महीनों में पटना में जलप्रलय के दौरान उनकी भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर सराही गयी थी. जल से घिरे लोगों के घरों तक खुद कांधे पर खाने-पीने का सामान ले कर पहुंच जाते थे. इसी तरह गरीबों की मदद करने की बात हो. बीमारों के इलाज का मामला हो. पप्पू कभी पीछे नहीं हटते. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद प्प्पू यादव की राजनीति की कई समस्यायें हैं. वह दिन रात की मेहनत के बावजूद सीमांचल के कुछ क्षेत्रों को छोड़ कर बिहार भर में स्वीकार्य नहीं हो पाते. 2019 के चुनाव में हार के बाद संसद में उनकी उपस्थिति नहीं है. बिहार असेम्बली में उनकी पार्टी का वजूद नहीं है.

Pappu Yadav का राजनीतिक सफर

1991 में पहली बार पप्पू यादव सांसद बने. यह वो दौर था जब लालू यादव की राजनीति चरम पर थी. सीमांचल में अगड़े व पिछड़े का संघर्ष जोरों पर था. पप्पू एक युवक के रूप में पिछड़ों की दबंग आवाज के रूप में सीमांचल में उभरे. उन पर हिंसा, अपराध, फिरौती के अलावा हत्या के भी आरोप लगे. लेकिन एक जुझारू नेता के रूप में आगे बढ़ते रहे और पांच बार सांसद बने.2014 में वह राजद में लालू के साथ औऱ शरद यादव को हरा कर संसद पहुंचे. लेकिन वह लालू के साथ टिक नहीं पाये. पप्पू परिवारवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार तरीके से बोलते हैं. लेकिन जरूरत पड़ने पर खुद अपनी मां को तो कभी अपनी पत्नी को चुनाव में लड़ाने से पीछे नहीं रहते. पप्पू को और उनकी राजनीति को अब तक बहुत संजीदगी से नहीं लिया गया. वह कम्युनिस्ट नेता अजित सरकार की हत्या के आरोप में जेल गये. फिलहाल पप्पू न तो खुद को दंबंग वाली पुरानी छवि से निकाल पाये हैं और न ही, उनकी बयानबाजियों ने उन्हें एक संजीदा नेता बनने में मदद की है.

दूसरी तरफ ना तो वह सत्ताधारी दल के गठबंधन का हिस्सा बन पाते हैं और न ही विपक्ष के किसी गठजोड़ का वह हिस्सा हो पाते हैं. लेकिन आज एक प्रेस कांफ्रेंस करके उन्होंने ऐलान किया कि बामसेफ और बामपंथ के साथ मिल कर वह सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष के राजद के खिलाफ जनता को गोलबंद करेंगे. उन्होंने कांग्रेस समेत अन्य दलों को कहा कि वे आयें और नेतृत्व करें. ऐसा नहीं है कि उन्होंने पहली बार ऐसा प्रयास किया है. उन्होंने ऐसी कोशिशि पहले भी की हैं. लेकिन उनकी आवाज को राजनीतिक खेमों में तवज्जो नहीं दी जाती. पप्पू यादव की सबसे बड़ी समस्या यही है. वह अकेल बहुत आगे जा पाने में सफल नहीं हो पाते तो दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन उन्हें अपने साथ लेने को तैयार नहीं हो पाता.

दर असल पप्पू राजनीति के छह-पांच को दिमाग के बजाये दिल से निपटना चाहते हैं. किसी जमाने में पप्पू ने राजद में रहते हुए खुद को लालू का असली वारिस बताया था. और यहां तक चैलेंज कर दिया था कि लालू के बेटे अगर चुनाव जीत गये तो वह राजनीति छोड़ देंगे. लेकिन हुआ उलटा. इसके बाद पप्पू ने अपनी कही बात पर माफी मांगी थी. पप्पू की दूसरी समस्या उनकी बयानबाजी है. वह भावनाओं में बह जाते हैं तो किसी के  भी खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं. कभी वह नीतीश की तारीफ करते हैं तो दूसरे ही पल नीतीश सरकार की बैंड भी बजाने लगते हैं. कभी वह चाहते हैं कि राजद उन्हें अपने साथ ले. वह कदम भी बढ़ाते हैं, पर दूसरे ही पल तेजस्वी यादव को ट्विटर ब्वाय और नाकारा तक कह कर अपनी सभावनाओं से खुद को वंचित कर लेते हैं.

पप्पू राजनीति करते हैं पर से भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते.

अब पप्पू यादव ने नया राग छेड़ा है. उनके इस राग में जहां भाजपा-जदयू गठबंधन पर हमला के तत्व दिख रहे हैं तो दूसरी तरफ वह राजद पर भी हल्ला बोलते हुए कह रहे हैं कि जदयू और राजद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

पप्पू की राजनीति की यही असल समस्या है. वह खुद को राज्यस्तर पर विकल्प बना पाने में नाकाम रहते हैं तो दूसरी तरफ किसी भी राजनीतिक विकल्प के साथ जुड़ पाने का हुनर भी नहीं जानते.

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