SaatRang : ओशो ने 50 साल पहले ही क्यों कहा वे राष्ट्रवादी नहीं हैं

SaatRang : ओशो ने 50 साल पहले ही क्यों कहा वे राष्ट्रवादी नहीं हैं

जब देवभूमि हरिद्वार में तथाकथित संत नफरत और हिंसा फैला रहे हों, तब यह जानना जरूरी है कि ओशो ने 50 साल पहले ही क्यों कहा था कि वे राष्ट्रवादी नहीं हैं।

कुमार अनिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ और भाजपा को छोड़कर आज हर व्यक्ति देवभूमि हरिद्वार में जिस प्रकार नफरत और हिंसा के लिए लोगों को भड़काया गया, उसकी निंदा कर रहा है। आज धर्म, राष्ट्रवाद के नाम पर जितना विष फैलाया जा रहा है, उसका कितना भयानक असर होगा, इसकी अभी ठीक-ठीक हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

ओशो इस जहर को समझते थे। तभी 50 साल पहले ही उन्होंने कहा था कि वे राष्ट्रवादी नहीं हैं। राष्ट्रवाद जहर है। उनके प्रवचनों के दौरान प्रश्न भी पूछे जाते थे। करंट के संपादक अयूब सईद ने एक सवाल किया कि आपकी धारणा में भारत पर कुछ कहें।

ओशो ने कहा-प्रिय अयूब सईद, मैं राष्ट्रवादी नहीं हूं। मेरे लिए भारत-पाकिस्तान-चीन-जापान मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखते। मैं पृथ्वी को खंडों में बंटा हुआ नहीं देखता। इस पृथ्वी का दुर्भाग्य है कि वह खंडों में बंटी हुई है। विज्ञान ने पृथ्वी को एक कर दिया, बस राजनीति बीच से हट जाए, तो मनुष्य का दुर्भाग्य मिट जाए। ओशो जिस राजनीति की बात कर रहे हैं, वह बांटनेवाली राजनीति आज हर आवरण उतार कर हमारे सामने आ गई है।

आज पृथ्वी पर वह सबकुछ मौजूद है। देवता भी पृथ्वी से ईर्ष्या करते होंगे। विज्ञान स्वर्ग के द्वार खोलता है, राजनीति द्वार को बंद कर देती है।

अगर भारत को सुखी होना है, तो दुनिया में सबसे पहले भारत खुद को अंतरराष्ट्रीय घोषित करे। भारत में वह परंपरा भी रही है। वसुधैव कुटुंबकम यहीं के ऋषि-मुनियों ने कहा। भारत कह दे कि वह क्षुद्र धारणाओं को नहीं मानता। दरे-सबेर कोई ऐसी घोषणा करेगा। स्वीटजरलैंड कर सकता है, कोई दूसरा देश कर सकता है। कोई न कोई देश करेगा। ओशो ने कहा, राष्ट्रवाद जहर है।

ओशो ने कहा कि वे राष्ट्रवाद, धर्मवाद, पंथवाद के विरोधी हैं। बस मनुष्य होना काफी है। मनुष्य अपने पूरे अतीत के साथ।

हरिद्वार में जो कुछ कहा गया, वह मनुष्यता के नाम पर कलंक है। जो कुछ लोग उसका बचाव कर रहे हैं, वे भी कल इस जहर से नहीं बच पाएंगे। इसलिए बोलना होगा। मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना होगा। सुजाता ने ट्वीट किया-भले लोग दुनिया के काम के नहीं क्योंकि उनसे समाज की गंदगी साफ़ नहीं होती। वे कहते हैं बचो, बहस से, जवाब देने से, तर्क-वितर्क से बचो। मुक्तिबोध कह गए हैं- जो है उससे बेहतर चाहिए, पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए। बनिए मेहतर- समाज के लिए। बुहार दीजिए जाति, पंथ, भेद-भाव सब।

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