Surgical Strike: सवर्ण आरक्षण पर खुशी से झूमने वालो जरा ठहरो, और यह लेख पढ़ लो

Surgical Strike: सवर्ण (Upper Caste Reservation) आरक्षण पर खुशी से झूमने वालो जरा ठहरो, और यह लेख पढ़ लो

आरक्षण का मुद्दा इतना पेचीदा रहा है कि इसने हर दौर में भारतीय समाज को झकझोड़ कर रख दिया है. विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में ओबीसी आरक्षण ने तो देश भर में हिंसक प्रदर्शन और यहां तक कि अनेक सवर्णों के आत्मदाह तक का कारण बना था.

अनुसूचित जातियों और जनजातियों को मिलने वाला आरक्षण कोई झटके में मिले तोहफा नहीं था. मुद्दतों के संघर्ष और जान की बाजी लगा कर इन तबकों ने आरक्षण हासिल किया था.

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SURGICAL STRIKE/ IRSHADUL HAQUE

यह सच है कि सवर्णों के आरक्षण की मांग भी दशकों से, एक वर्ग करता रहा है. लेकिन दूसरा सच भी यही है कि इसी वर्ग के लोग एससी-एसटी आरक्षण को ही समाप्त करने का आंदोलन चलाते रहे हैं. इस वर्ग का तर्क रहा है कि आरक्षण से योग्यता के साथ नाइंसाफी होती है. उनका तर्क होता है कि ऑपरेशन के बाद मरीजों के पेट में आरक्षित वर्ग के डॉक्टर ही कैंची छोड़ देते हैं.

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ऐसे में अब सवाल उठता है कि केंद्र की मोदी कैबिनेट ने आव देखा ना ताव और अचनाक सवर्ण जातियों के गरीबों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण ( quota for upper caste poor) की घोषणा कर दी. आखिर उसने ऐसा क्यों किया? कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार से मोदी सरकार ने सबक लिया है. उनका कहना है कि मोदी भापा से सवर्ण नाराज थे. इसलिए सवर्णों को मनाने की यह रणनीति है. जबकि ऐसा तर्क ईमानदारी के बजाये रणनीतिक है क्योंकि उन तीनों राज्यों में सवर्णों की ही सिर्फ नाराजगी नहीं थी.

 

रही बात सवर्ण आरक्षण (Upper Caste reservation)  के विरोध की तो चूंकि कांग्रेस समेत अनेक रिजनल पार्टियां अपने बयानों में सवर्णों के आरक्षण की बात समय समय पर करती रही हैं, लिहाजा अन्य पिछड़े वर्ग और दलित जातियां इस आरक्षण का व्यापक रूप से राजनीतिक या सामाजिक स्तर पर विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं होंगी. इसके अलावा मोदी कैबिनेट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सवर्णों का यह आरक्षण, पहले से मिल रहे आरक्षण कोटे से अलग होगा. यानी सवर्णों को बाकी बचे पचास प्रतिशत सीटों में से दस प्रतिशत रिजर्वेशन दिया जायेगा. लिहाजा यह भी तय है कि इससे पहले से आरक्षण ले रही जातियों का कोई खास नुकसान नहीं होगा.

 

ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि क्या सवर्णों का मोदी आरक्षण इतनी आसानी से लागू हो जायेगा?

यह एक विचारणीय सवाल है. इसकी अनेक पेचीदगियां हैं. अनेक तथ्य और दर्जनों तर्कों की कसौटी पर सवर्ण आरक्षण को गुजरना होगा. लिहाजा इसे समझना जरूरी है.

एक

अगर संसद ने आरक्षण संबंधी विधेयक पारित कर भी दिया तो सवाल यह होगा कि आखिर जो आधार सरकार तय करेगी उसकी वैज्ञानिकता क्या होगी?

अभी तक के प्रावधानों के हिसाब से ओबीसी, एससी एसटी की जितनी आबादी है उस आबादी के अनुरूप ही करीब आरक्षण उस वर्ग को दिया जाता है. जैसे एससी एसटी को क्रमश:22 प्रतिशत व 7.5 प्रतिशत. जबकि जब ओबीसी के आरक्षण की बात आई तो उसकी आबादी का कोई नवीनतम आंकड़ा देश के पास उपलब्ध नहीं था. 1931 के बाद ये आंकड़े जारी नहीं हुए. तब 54 प्रतिशत इनकी आबादी मानी गयी. पर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 49.5 प्रतिशत पर ताला लगा दिया.

मान लिया जाये कि सरकार संविधान संशोधन करती है तो ऐसे में भले ही सुप्रीम कोर्ट की बंदिश से यह आरक्षण आजाद हो जाये पर सवाल यह है कि सवर्णों के गरीबों को दस प्रतिशत आरक्षण देने का आधार क्या होगा?  क्या सरकार के पास सवर्णों की आबादी का कोई रिकार्ड है? और इस रिकार्ड में गरीबों सवर्णों की आबादी कितनी है? अगर आबादी का कोई रिकार्ड नहीं तो आरक्षण देने का आधार क्या है?

दो

भारतीय संविधान में आरक्षण का आधार आर्थिक पेछड़ेपन नहीं है. सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दूर करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था है. लेकिन अगर संविधान संशोधन कर भी लिया जाये तो बड़ा सवाल यह होगा कि ऐसे ही तर्क को शोषित समाज भी सामने लायेगा. माना जाता है कि विभिन्न समुदायों के अगड़ी जातियों की आबादी, कुल आबादी का 15 प्रतिशत है. तो 15 प्रतिशत वाली आबादी के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण किस आधार पर दिया जा सकता है. क्योंकि पिछड़ों और दलितों की आबादी 85 प्रतिशत है तो उन्हें महज 49.5 प्रतिशत आरक्षण के दायरे में क्यो समेटा जायेगा?  आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात होगी तो उनके आरक्षण का दायरा 60 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ाना होगा. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए तेजस्वी यादव ने कहा है कि 15 फीसदी आबादी को 10 फीसदी आरक्षण मिलता है तो 85 प्रतिशत की आबाद को 90 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए. तेजस्वी के इस बयान को सिर्फ राजनीतिक बयान कहके दरकिनार नहीं किया जा सकता.

तीन

आरक्षण का समुचित लाभ देश के जरूरतमंद परिवारों को तभी होगा जब जातीय व आर्थिक गणनना के रिकार्ड सार्वजनिक किये जायें. क्योंकि जब हमारे पास रिकार्ड ही नहीं होंगे तो आरक्षण का ईमानदारी से वितरण कैसे संभव है? आरक्षण का समुचित लाभ लेने के लिए उसका वैज्ञानिक आधार जरूरी है. संविधान संशोधन के दौरान ये मुद्दे अहम होंगे क्योंकि अल्टीमेटली अगर संविधान में इसकी व्यवस्था तर्कपूर्ण नहीं होगी तो लोग सुप्रीम कोर्ट के सरण में जायेंगे और आरक्षण की इस व्यस्था को चुनौती दे सकते हैं.

हमारे पास गरीबी के पैमाने की जांच के लिए NSSO ( National Sample Survey) के आंकड़ें हैं. इसके अनुसार हिंदू अपर कास्ट में 10.5 प्रतिशत ( 11.7 प्रतिशत ग्रामीण और 9 प्रतिशत शहरी) के आसपास गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग हैं. मुस्लिम अपर कास्ट में यह 26 प्रतिशत शहरी व 34 प्रतिशत ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे हैं. इसी तरह ईसाई में 9 प्रतिशत शहरी तो 5 प्रतिश ग्रामीण, गरीबी रेखा से नीचे है. दूसरी तरफ ओबीसी की जहां तक बात है तो 27 प्रतिशत शहरी और 29 प्रतिशत ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे हैं.

यहां प्रशन यह उठता है कि जातियों के हिसाब से गरीबी के आंकड़े प्रभावित होते हैं. ऐसे में Million Dollar सवाल यह है कि कुल सौ सीटों में से दस सीटें महज पदंरह प्रतिशत आबादी के गरीबों के लिए किस आधार पर आरक्षित की जा सकती हैं?  क्योंकि पिछड़ों दलितों की कुल आबादी का ज्यादा हिसाब गरीब है जबकि अगड़ों की कुल आबादी की प्रतिशत में गरीबी काफी कम है.

नतीजा

ऐसे में सवाल यह है कि आगे क्या होगा?  आरक्षण के लाभ को वैज्ञानिक और तार्किक बनाने के लिए जरूरी है कि हमारे पास आंकड़े उपलब्ध हों, जो कि नहीं हैं. और अगर आंकड़ें सामने आ गये तो आरक्षण का पूरा निजाम ही इस मसले पर झकझोड़ के रह जायेगा. और यह लड़ाई अदालत तक पहुंच जायेगी. इस मामले का दूसरा संभावित नतीजा यह हो सकता है कि  भले ही राजनीतिक दल सवर्ण आरक्षण का विरोध ना करें पर बीच का रास्ता निकालने के लिए कम से कम दस प्रतिशत आरक्षण को और कम करना ही होगा.

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