क्या है नताशा और कलिता का पिंजड़ा तोड़ आंदोलन

क्या है नताशा और कलिता का पिंजड़ा तोड़ आंदोलन

जेल से छूटने पर नताशा नरवाल व देवांगना कलिता के हौसले की खूब तारीफ हो रही है। बोलीं-हम बाहर आए, पर अनेक अभी जेल में हैं। क्या है पिंजड़ा तोड़ आंदोलन।

आज देश के कई प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा की तस्वीर छपी है। दोनों लड़कियां जेएनयू की छात्रा हैं और तन्हा जामिया के। नताशा और देवांगना पिंजड़ा तोड़ आंदोलन से जुड़ी हैं।

पिंजड़ा तोड़ ग्रुप का गठन इन्हीं दो लड़कियों ने आज से छह साल पहले 2015 में किया। इसका उद्देश्य छोटे शहरों और गांवों से दिल्ली पढ़ाई के लिए आनेवाली लड़कियों के छात्रावास की समस्याओं को दूर करना था। हर छात्रावास, निजी हॉस्टल में ऐसे नियम होते हैं, जिससे छात्राओं को पढ़ाई से लेकर तमाम तरह की मुश्किलें आती हैं। छात्रों के लिए अलग नियम होते हैं और छात्राओं के लिए अलग। इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पिंजड़ा तोड़ ग्रुप बना।

पिंजड़ा तोड़ को पहली सफलता के लिए तीन साल संघर्ष करना पड़ा। इनके संघर्ष के कारण जामिया की छात्राएं अब रात 10.30 तक बाहर रह सकती हैं। इन्हें दूसरी सफलता तब मिली, जब इन्होंने दिल्ली के सभी विवि के हॉस्टलों में लड़कियों के साथ भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। महिला आयोग से मिलीं और लड़कियों की परेशानी से अवगत कराया। इसके बाद आयोग ने सभी 23 निबंधित विवि को नोटिस भेजा।

पिंजड़ा तोड़ ग्रुप राजनीतिक और वैचारिक रूप से काफी परिपक्व है। इस ग्रुप की प्रेरणा स्रोत हैं सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख, जो भारत में महिला शिक्षा को आगे बढ़ानेवाली दो महान हस्तियां रही हैं।

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ग्रुप सीएए विरोधी आंदोलन का सक्रिय हिस्सा रहा। इसके ट्वीटर हैंडल पिंजड़ा तोड़ पर जाएं, तो आपको महिलाओं के हक-अधिकार के संघर्ष की अनेक कहानियां मिलेंगी। यह ग्रुप फिलहाल दिल्ली तक ही सीमित है। आज यह ग्रुप महिला अधिकार, स्वतंत्रता, लोकतंत्र के लिए संघर्ष करनेवाले ग्रुप के रूप में स्थापित हो चुका है। धार्मिक-जातीय भेदभाव, किसी भी तबके पर उत्पीड़न के विरुद्ध यह ग्रुप मुखर है। जेल से निकलने पर दोनों ने जो कहा, वह गौर करनेवाली बात है। कहा- हम छूट गए, पर जनता के लिए संघर्ष करनेवाले अनेक लोग अब भी जेल में हैं। उन्हें भी बाहर लाने के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

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